class 11 physics notes pdf in hindi – chapter 9 – ठोसों के यांत्रिक गुण (Mechanical properties of solids)

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 chapter 9 – ठोसों के यांत्रिक गुण (Mechanical properties of solids)

  • प्रत्यास्थता (Elasticity) –

किसी पिण्ड का वह गुण, जिससे वह प्रत्यारोपित बल को हटाने पर अपनी प्रारंभिक आकृति एवं आकार को पुनः प्राप्त कर लेता है, प्रत्यास्थता कहलाता है तथा उत्पन्न विरूपण प्रत्यास्थ विरूपण कहलाता है।

अतः, प्रत्यास्थता पदार्थ का वह गुण है जिसके कारण वस्तु पर लगनेवाले विरूपक बल को हटा लेने पर वस्तु अपना मूल आकार और रूप प्राप्त कर लेती है।

बाह्य बल के अधीन वस्तु में होनेवाले परिवर्तन की प्रकृति को देखते हुए पदार्थों को दो श्रेणियों में बाँटा गया है। वस्तु पर लगनेवाले बाह्य बल को विरूपक बल (deforming force) तथा वस्तु में बल के कारण होनेवाले परिवर्तन को विरूपण (deformation) कहा जाता है।

  • पूर्णतः प्रत्यास्थ (perfectly elastic) –

वैसे पदार्थ जो विरूपक बल हटा लेने पर अपने पूर्व आकार और रूप पूर्णतः प्राप्त कर लेते हैं, पूर्णतः प्रत्यास्थ (perfectly elastic) कहलाते हैं।

  • अप्रत्यास्थ या प्लैस्टिक (plastic) –

वैसे पदार्थ जो विरूपक बल हटा लेने पर अपनी पूर्वावस्था में नहीं लौटते अर्थात हमेशा के लिए विरूपित हो जाते हैं, अप्रत्यास्थ या प्लैस्टिक (plastic) कहलाते हैं।

  • प्रतिबल

    (Stress): – (σ )

वस्तु के कणों के बीच सापेक्षिक स्थानान्तरण होने के कारण एक प्रतिक्रियात्मक बल की उत्पत्ति होती है । यह बल वस्तु को पहली स्थिति में लाने की चेष्टा करता है । इस बल का मान विरूपक बल के बराबर तथा विपरीत होता है । इसी बल को प्रतिबल कहते हैं । वस्तु के एकांक क्षेत्रफल पर लानेवाले बल से प्रतिबल की माप होती है ।

  • प्रतिबल (stress) तीन तरह के होते हैं –

(I)अनुदैर्घ्य प्रतिबल (Longitudinal stress),

(ii) अभिल५ प्रतिबल और स्पर्शरेखीय प्रतिबल (Normal stress and Tangential stress)

(iii) विरूपक प्रतिबल (Shearing stress)

 

(i) अनुदैर्घ्य प्रतिबल : –

जब किसी वस्तु पर लंबाई की दिशा में कोई विरूपक बल (deforming force) लगाया जाता है, तो इस बल के कारण प्रति एकांक लंबाई में परिवर्तन को अनुदैर्घ्य विकृति (linear strain) कहते हैं। वस्तु के प्रति एकांक क्षेत्रफल पर कार्य करनेवाले बल को अनुदैर्घ्य प्रतिबल कहते हैं।

(ii) अभिलम्ब प्रतिबल :-

जब A क्षेत्र के लम्बवत् F बल कार्य करता है, तो अभिलम्ब प्रतिबल का मान F होता है । .

स्पर्शरेखीय प्रतिबल : अगर किसी क्षेत्र A पर F बल क्षेत्र के पृष्ठ की समानान्तर दिशा में स्पर्श करते हुए कार्य करता है, तो स्पर्शरेखीय प्रतिबल का मान F होता है ।

(iii) विरूपक प्रतिबल :

विरूपक प्रतिबल को चित्र-7.3 की मदद से भलीभाँति समझा जाता है । माना कि एक ठोस घन के निचले तथा ऊपर पृष्ठों पर बराबर-बराबर स्पारेखीय बल F एक-दूसरे के विपरीत दिशा में क्रियाशील हैं । ऐसी स्थिति में घन विरूपण में समझा जाता है, क्योंकि इन बालें के कारण घन का केवल रूप बदलता है । अगर उस पृष्ठ का क्षेत्रफल A है, तो विरूपक प्रतिबल का मान F होता है ।

प्रतिबल का. मात्रक परिभाषा के अनुसार सी० जी० एस० (C.G.S) पद्धति में डायन/सेमी^{2} तथा एम० के० एस० (M.K.S) या S.I पद्धति में न्यूटन/मी^{2} या पास्कल है । विमा के अनुसार प्रतिबल का मात्रक किग्रा मी-1 से-2 (kgm^{-1}s^{-2}).

होता है । पास्कल के लिए संक्षेप में पा (pa) लिखा जाता है । [csscanned with CamScanner. 1 पास्कल = 1 पा = 1 न्यूटन/मी^{2}

 

  • विरूपक बल

किसी भी वस्तु पर बल लगाकर उसके आकार आदि में परिवर्तन लाया जा सकता है ऐसा बल प्रायः विरूपक बल कहलाता है |

 

  • विकृति (Strain)- (ε)

जब किसी वस्तु पर विरूपक बल लगाए जाते हैं तो वस्तु के आकार या रूप अथवा दोनों में परिवर्तन हो जाता है और वस्तु को विकृत (strained) कहा जाता है। आरोपित विरूपक बल (deforming force) के कारण वस्तु के प्रति एकांक आकार (unit dimension) में उत्पन्न परिवर्तन को विकृति कहते हैं।चूँकि विकृति एक अनुपात (ratio) है, अतः इसका कोई मात्रक नहीं होता है  |

 

विकृति तीन प्रकार की होती हैं –

(a) अनुदैर्घ्य विकृति (longitudinal strain)

(b) आयतन विकृति (volume strain) तथा

(c) अपरूपण विकृति (shearing strain)

 

(a) अनुदैर्घ्य विकृति (Longitudinal strain)-

जब किसी वस्तु पर लंबाई की दिशा में विरूपक बल (deforming force) लगाए जाते हैं तब उस वस्तु की प्रति एकांक लंबाई में होनेवाले परिवर्तन को उस वस्तु की अनुदैर्घ्य विकृति कहते हैं।

यदि किसी वस्तु अथवा छड़ की प्रारंभिक लंबाई L हो और उसपर आरोपित बल से उसकी लंबाई में परिवर्तन ΔL हो, तो

अनुदैर्घ्य विकृति = \frac {लंबाई में परिवर्तन}{ प्रारंभिक लंबाई} = \frac {ΔL}{L}

[अनुदैर्घ्य विकृति केवल ठोस पदार्थों में ही होती है।]

(b) आयतन विकृति (Volume strain)

जब किसी वस्तु की सतह के प्रत्येक बिंद पर लंबवत समान बल लगाए जाते हैं तब उसका केवल आयतन ही बदलता है, उसके रूप (shape) में कोई परिवर्तन नहीं होता।

वस्तु के प्रति एकांक आयतन में जितना परिवर्तन होता है, उसे आयतन विकृति कहते हैं।

यदि किसी वस्तु का प्रारंभिक आयतन V और उसपर आरोपित बल से उसके आयतन में परिवर्तन ΔV हो, तो

आयतन विकृति =  \frac {आयतन में परिवर्तन}{ प्रारंभिक आयतन} = \frac { ΔV}{ V}

[द्रवों तथा गैसों में आयतन विकृति होती है।]

 

(c) अपरूपण विकृति (Shearing strain)-

अपरूपण विकृति में वस्तु की केवल आकृति (shape) बदल जाती है, उसके आयतन में कोई परिवर्तन नहीं होता। अपरूपण विकृति रेडियन में मापा जानेवाला अपरूपण कोण है।

मान लिया कि ABCD स्थिर सतह की लंब काट को प्रदर्शित करता है। इसकी सतह CD स्थिर है और सतह AB के समांतर एक बल (F) लगाया जाता है। यह काट अपरूपित (sheared) स्थिति में A’B’CD से प्रदर्शित किया गया है (चित्र 10.4 )। स्पष्ट रूप से अपरूपण विकृति Ө हैं।

(Ө को अपरूपण कोण भी कहते हैं।)

अपरूपण विकति = Ө = \frac {AA'}{AD}  = \frac {l}{L}

[अपरूपण विकृति केवल ठोसों में ही होती है।]

 

  • प्रत्यास्थता सीमा (Elastic Limit)

जब किसी धातु के तार या स्प्रिंग पर भार लटकाया जाता है तो वह लंबाई में बढ़ जाता है। भार हटा लेने के बाद वह फिर अपनी पुरानी स्थिति में आ जाता है। यदि तार या स्प्रिंग पर लटकाए गए भार का मान धीरे-धीरे बढ़ाया जाए तो एक ऐसी स्थिति आ जाती है जबकि उससे अधिक भार को रखकर हटा लेने पर वह अपनी पूर्व स्थिति में नहीं लौटती। ऐसी अवस्था में तार या स्प्रिंग हमेशा के लिए विकृत (strained) हो जाती है। इसे इस प्रकार भी कह सकते हैं कि उसके प्रत्यास्थता का गण नष्ट हो गया है। इस प्रकार तार या स्प्रिंग में प्रत्यास्थता तब तक ही रहती है जब तक कि उस पर आरोपित बल (लटकनेवाला भार) का मान एक निश्चित सीमा के अंदर होता है।

पदार्थों का वैसा सीमा जिससे आगे उसकी प्रत्यास्थता का गुण समाप्त हो जाता है, प्रत्यास्थता सीमा (elastic limit) कहते हैं।

जब आरोपित बल का मान प्रत्यास्थता सीमा से अधिक हो जाता है तब वस्तु अपना पूर्व आकार नहीं प्राप्त कर पाती।

 

  • हुक का नियम (Hooke’s Law)-

1678 में रॉबर्ट हुक (Robert Hooke) ने प्रयोगों के आधार पर एक नियम का प्रतिपादन किया जो निम्नलिखित है –

कम विरूपण (small deformation) के लिए, प्रतिबल हमेशा विकृति के समानुपाती होता है।

अर्थात,      प्रतिबल ∝  विकृति  = σ ∝ ε

 

  • प्रत्यास्थता गुणांक (modulus of elasticity) –

प्रतिबल तथा विकृति के अनुपात को प्रत्यास्थता गुणांक (modulus of elasticity) कहते हैं और इसे E से सूचित करते हैं। अतः,

प्रत्यास्थता गुणांक E = \frac { प्रतिबल }{ विकृति}

कम विरूपण के लिए E का मान किसी पदार्थ-विशेष के लिए नियत (constant) होता है, परंतु भिन्न-भिन्न पदार्थों के लिए इसका मान भिन्न होता है।

 

  • यंग प्रत्यास्थता गुणांक (Young’s Modulus of Elasticity)

कम विरूपण (small deformation) के लिए अनुदैर्घ्य प्रतिबल और अनुदैर्घ्य विकृति के अनुपात को वस्तु के पदार्थ का यंग प्रत्यास्थता गुणांक (Young’s modulus of elasticity) कहते हैं और इसे Y से सूचित करते हैं।

अतः, यंग प्रत्यास्थता गुणांक Y = \frac { अनुदैर्घ्य प्रतिबल}{ अनुदैर्घ्य विकृति}

यदि A अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफलवाली किसी वस्तु की लंबाई L हो और लंबाई की दिशा में लगनेवाले बल F के कारण वस्तु की लंबाई में वृद्धि AL हो जाए, तो

अनुदैर्घ्य प्रतिबल = \frac {F}{A} तथा अनुदैर्घ्य विकृति = \frac {ΔL}{L}

Y = \frac {\frac{F}{A}}{\frac{ΔL}{L}}

यंग प्रत्यास्थता गुणांक का SI मात्रक N m^{-2} होता है और इसकी विमाएँ ML^{-1} T^{-2} होती हैं।

[cgs पद्धति में Y का मात्रक dyne cm^{-2} होता है।]

 

  • आयतन प्रत्यास्थता गुणांक (Bulk Modulus of Elasticity)-

जब किसी वस्तु की पूरी सतह पर लंबवत दिशा में समान रूप से विरूपक बल लगाया जाता है तो वस्तु के आयतन में परिवर्तन होता है, आकृति (shape) में परिवर्तन नहीं होता। यदि वस्तु की पूरी सतह का क्षेत्रफल A हो और पूरी सतह पर लगनेवाले विरूपक बल का परिमाण F हो, तो

प्रतिबल = \frac {F}{A}

फिर, यदि वस्तु का आयतन V तथा विरूपक बल के कारण आयतन में उत्पन्न परिवर्तन ΔV हो, तो

आयतन विकृति = \frac {ΔV}{V}

कम विरूपण के लिए, प्रतिबल और आयतन विकृति के अनुपात को वस्तु के पदार्थ का आयतन प्रत्यास्थता गुणांक (Bulk modulus of elasticity) कहते हैं और इसे K से सूचित करते हैं।

प्रतिबल अतः, आयतन प्रत्यास्थता गुणांक K = \frac {प्रतिबल}{आयतन विकृति}

= \frac {\frac {F}{A}}{\frac {-ΔV}{V}}

= \frac {F}{A} = Δp

= K =  – \frac { Δp }{\frac{ΔV}{V}} = -V \frac { Δp}{ ΔV}

 

[ ऋणात्मक चिह्न इस तथ्य का संकेत करता है कि दाब बढ़ने से आयतन में ह्रास होता है।]

आयतन प्रत्यास्थता गुणांक का SI मात्रक Nm-2 होता है और इसकी विमाएँ (dimensions) ML^{-1} T^{-2} होती हैं।

[आयतन गुणांक के व्युत्क्रम अर्थात \frac {1}{K} – को वस्तु के पदार्थ की संपीड्यता (compressibility) कहते हैं।]

 

  • दृढ़ता गुणांक (Modulus of Rigidity) – (अपरूपण गुणांक) –

कम विरूपण के लिए, स्पर्शरेखीय प्रतिबल (tangential stress) और अपरूपण विकृति (shearing strain) के अनुपात को वस्तु के पदार्थ का दृढ़ता गुणांक (modulus of rigidity). कहते हैं और इसे n से सूचित करते हैं।

दृढ़ता गुणांक = \frac { स्पर्शरेखीय प्रतिबल}{ अपरूपण विकृति} = \frac {\frac{A}{B}}{Ө}

= \frac {F}{A}{l}{L} = \frac {FL}{AL}

दृढ़ता गुणांक का SI मात्रक N m^{-2} होता है और इसकी विमाएँ ML^{-1} T^{-2} होती हैं।

 

  • प्रतिबलविकृति वक्र – (sress strain curve)-

तनन प्रतिबल (tensile stress) के अंतर्गत किसी दिए गए द्रव्य के लिए प्रतिबल तथा विकृति के बीच संबंध प्रयोग द्वारा जाना जा सकता है।

प्रतिबल-विकृति वक्र, प्रतिबल और विकृति के बीच के सम्बन्ध को दर्शाती है |  

भिन्न-भिन्न द्रव्यों के लिए प्रतिबल-विकृति वक्र भिन्न-भिन्न होते हैं।

तनन गुणों की मानक जाँच में, किसी परीक्षण बेलन या तार को एक प्रत्यारोपित बल द्वारा विस्तारित किया जाता है। लंबाई में भिन्नात्मक अन्तर (विकृति) तथा इस विकृति को उत्पन्न करने के लिए आवश्यक प्रत्यारोपित बल को रिकार्ड करते हैं। प्रत्यारोपित बल को धीरे-धीरे क्रमबद्ध चरणों में बढ़ाते हैं और लंबाई में परिवर्तन को नोट करते जाते हैं। प्रतिबल (जिसका मान एकांक क्षेत्रफल पर लगाए गए बल के मान के बराबर होता है) और उससे उत्पन्न विकृति के बीच एक ग्राफ खींचते हैं। किसी धातु के लिए ऐसा एक प्रारूपिक ग्राफ चित्र 9.3 में दिखाया गया है। संपीडन तथा अपरूपण प्रतिबल के लिए भी सदृश ग्राफ प्राप्त किए जा सकते हैं। भिन्न-भिन्न द्रव्यों के लिए प्रतिबल-विकृति वक्र भिन्न-भिन्न होते हैं। इन वक्रों की सहायता से हम यह समझ सकते हैं कि कोई दिया हआ द्रव्य बढ़ते हए लोड के साथ कैसे विरूपित होता है। ग्राफ से हम यह देख सकते हैं कि 0 से A के बीच में वक्र रैखिक है। इस क्षेत्र में हुक के नियम का पालन होता है। जब प्रत्यारोपित बल को हटा लिया जाता है तो पिण्ड अपनी प्रारंभिक विमाओं को पुनः प्राप्त कर लेता है। इस क्षेत्र में ठोस एक प्रत्यास्थ पिण्ड जैसा आचरण करता है।

A से B के बीच के क्षेत्र में प्रतिबल तथा विकृति अनुक्रमानुपाती नहीं है। फिर भी भार हटाने पर पिण्ड अभी भी अपनी प्रारंभिक विमाओं पर वापस आ जाता है। वक्र में बिंदु B पराभव बिंदु (अथवा प्रत्यास्थ सीमा) कहलाता है और संगत प्रतिबल को द्रव्य का पराभव सामर्थ्य (o.) कहते हैं।

यदि भार को और बढ़ा दिया जाए तो उत्पन्न प्रतिबल पराभव सामर्थ्य से अधिक हो जाता है और फिर प्रतिबल में थोड़े से अंतर के लिए भी विकृति तेज़ी से बढ़ती है। वक्र का B और D के बीच का भाग यह दर्शाता है। B और D के बीच किसी बिंदु, मान लें C, पर जब भार को हटा दिया जाए तो पिण्ड अपनी प्रारंभिक विमा को पुनः प्राप्त नहीं करता है। इस स्थिति में जब प्रतिबल शून्य हो जाए तब भी विकृति शून्य नहीं होती है। तब यह कहा जाता है कि द्रव्य में स्थायी विरूपण हो गया। ऐसे विरूपण को प्लास्टिक विरूपण कहते हैं। ग्राफ पर बिंदु D द्रव्य की चरम तनन सामर्थ्य (o,) है। इस बिंदु के आगे प्रत्यारोपित बल को घटाने पर भी अतिरिक्त विकृति उत्पन्न होती है और बिंदु E पर विभंजन हो जाता है। यदि चरम सामर्थ्य बिंदु D और विभंजन बिंदु E पास-पास हों तो द्रव्य को भंगुर कहते हैं। यदि वे अधिक दूरी पर हों तो द्रव्य को तन्य कहते हैं।

 

  • प्वासों का अनुपात (Poisson Ratio) –

कम विरूपण (deformation) के लिए, पाशवीय विकृति (lateral strain) और अनुदैर्घ्य विकृति quongitudinal strain) के अनुपात को प्वासों का अनुपात (Poisson ratio) कहते हैं और इसे σ

से सूचित करते हैं।

अतः, प्वासों का अनुपात σ = \frac { पार्श्वीय विकृति }{ अनुदैर्घ्य विकृति}

उदाहरणार्थ – जब एक सिरे पर आबद्ध किसी तार के एक सिरे को खींचा जाता है, अर्थात बल लगाया जाता है तो तार की लंबाई तो बढ़ ही जाती है, और इसके साथ ही उसके व्यास में कमी आ जाती है।

 

यदि तार की प्रारंभिक लंबाई और व्यास क्रमशः L एवं D हों और लंबाई के अनटिश लगाने से दैर्घ्यवृद्धि (elongation) तथा पाश्विक संकुचन (lateral contraction) क्रमण AD हों, तो

पाश्र्वीय विकृति = \frac {ΔD}{D} तथा अनुदैर्घ्य विकृति में \frac{ ΔL}{L}

σ = \frac {\frac{ΔD}{D}}{\frac { ΔL}{L}} = – \frac{L}{D} \frac{ΔD}{ΔL}

प्वासों का अनुपात (σ) केवल एक संख्या है। इसका न तो मात्रक होता है और न विमा |

[ प्वासों का अनुपात केवल ठोस पदार्थों के लिए होता है। यह दिखाया जा सकता है कि के सीमांत मान (limiting value) 0.5 तथा -1]

 

  • यंग का प्रत्यास्था गुणांक ज्ञात करना (Determination of Young’s Modulus) सिद्धांत (Theory) –

तार के रूप में उपलब्ध यदि किसी पदार्थ के यंग-गणांक Y का मान निकालना हो, तो निम्नलिखित सूत्र का व्यवहार किया जाता है—

यदि तार की प्रारंभिक लंबाई L और उसकी त्रिज्या । हो तथा उसपर M भार लटकाने पर उसकी लंबाई में वृद्धि । हो, तो

Y = \frac { अनुदैर्घ्य प्रतिबल }{ अनुदैर्घ्य विकृति} = \frac {\frac {Mg}{ пr^{2}}}{\frac {l}{L}}

या

Y = \frac { MgL }{ пr^{2}l}

उपर्युक्त सूत्र का व्यवहार कर Y का मान निकालने की दो विधियाँ हैं –

 

(i) वर्नियरविधि (Vernier’s method) —

जिस धातु का, को मान लिया कि इस्पात का, यंग-गुणांक निकालना है, तो के एक-जैसे दो लंबे तार एक सुदृढ़ स्तंभ से पास-पास लटका जाते हैं। इसमें एक तार A को प्रायोगिक तार (experimental wire) तथा दसरे तार B को सहायक तार (auxiliary wire) कहते हैं। तार B के निचले सिरे पर एक वर्नियर का मुख्य स्केल (main scale) s तथा हैंगर H_{2} लगे रहते हैं तथा दूसरे तार A में वर्नियर तथा हैंगर H, लगे रहते हैं। वर्नियर V, स्केल S को छूता हुआ लटकता है (चित्र 10.6)। दोनों तारों में मुर्रियाँ (kinks) न रहें तथा वे अच्छी तरह तने रहें इसके लिए H तथा H, में निश्चित भार लटका दिए जाते हैं। इन भारों को अचल भार (dead load) कहते हैं। निलंबन-बिंदु (point of suspension) से तार A जहाँ वर्नियर से जडा रहता है उसकी दूरी माप ली जाती है, जो तार की प्रारंभिक लंबाई L का मान होता है।

    …………(10.6)

अब वर्नियर में शून्य की स्थिति मुख्य स्केल पर पढ़ ली जाती है। इसके बाद प्रायोगिक तार में आधे किलोग्राम भार का वाट देकर, अर्थात हैंगर H_{1} पर रखकर वर्नियर के शून्य की स्थिति फिर ज्ञात की जाती है। वर्नियर के दोनों पाठ्यांकों के अंतर से आधे किलोग्राम भार के कारण तार की लंबाई में वृद्धि ज्ञात हो जाती है। तार पर आधा-आधा किलोग्राम भार बढ़ाते जाते हैं और प्रत्येक बार वर्नियर की स्थिति पढ़ते जाते हैं। परंतु, प्रायोगिक तार पर रखे गए कुल भार का मान तार के तोड़न-भार (breaking weight) के मान के आधे से अधिक नहीं होना चाहिए। अब हैंगर H_{1}, पर रखे भार में से उसी क्रम में एक-एक बाट उतारते जाते हैं और प्रत्येक बार वर्नियर का पाठ्यांक पुनः नोट करते जाते हैं। इस प्रकार आधा किलोग्राम भार के कारण लंबाई में उत्पन्न वृद्धि । का मान ज्ञात कर लेते हैं। फिर स्क्रूगेज (screw gauge) की सहायता से तार A के भिन्न-भिन्न स्थानों पर एक दिशा और समकोणिक दिशा में व्यास के पाठ्यांक लेकर तार की औसत त्रिज्या r ज्ञात कर लेते हैं।

फिर, सूत्र Y = \frac {MgL}{ пr^{2}l} की सहायता से यंग-गुणांक का मान निकाल लेते हैं।

M का मान X-अक्ष पर तथा । का मान Y-अक्ष पर लेकर एक ग्राफ खींचने पर एक सरल रेखा प्राप्त होती है (चित्र 10.7)। किसी उचित लंबाई में वृद्धि पर संगत भार का मान इस ग्राफ से भी ज्ञात कर ऊपर दिए गए समीकरण से यंग-गुणांक Y की गणना की जा सकती है।

    ……………(10.7)

 

(b) सर्ल की विधि (Searle’s method) – 

पतले तार के लिए यंग-गुणांक का मान सर्ल की विधि से भी निकाला जा सकता है। [वास्तव में यह विधि ‘वर्नियर-विधि’ का ही सशोधित रूप है जिसमें लंबाई की वृद्धि वर्नियर से न मापकर ‘माइक्रोमीटर पेंच’ michan screw) से मापी जाती है।] –

सर्ल के उपकरण में एक ही पदार्थ के बने, समान लंबाई और त्रिज्या के दो तार A और B एकही दृढ़ आधार से लटकाए रहते हैं। प्रत्येक तार के निचले सिरे पर धातु का एक-एक आयताकार फ्रेम (C और D) जुड़ा रहता है (चित्र 10.8)। दोनों फ्रेम से एक-एक हैंगर (hanger) लटकता है- इनमें एक हैंगर T पर एक नियत भार रखा जाता है तथा दूसरे हैंगर S पर कटे हुए बाट (slotted weights) रखे जा सकते हैं। दोनों फ्रेम एक क्रॉस-छड़ (cross bar) GH से बहुत हलके ढंग से संबंधित रहते हैं जिससे कि दोनों फ्रेम स्वतंत्रतापूर्वक नीचे जा सकें।

एक स्पिरिट लेवल (spirit level) L का एक सिरा सहायक तार B से लगे फ्रेम पर कब्जे द्वारा जुड़ा रहता है और दूसरा सिरा प्रायोगिक तार A से लगे फ्रेम में एक माइक्रोमीटर-पेंच M की नोक पर टिका रहता है। पेंच में एक अंशांकित चकती (graduated disc) रहती है और इसके लंबवत एक स्केल रहता है। यह व्यवस्था स्फेरोमीटर जैसी होती है। चकती सामान्यतः 100 विभागों में बँटी रहती है।

प्रयोग प्रारंभ करने के पहले दोनों हैंगरों पर इतना बाट रख दिया जाता है कि तार सीधा तन जाए। निलंबन-बिंदु से तार A जहाँ फ्रेम C से जुड़ा रहता है, उसकी लंबाई माप ली जाती है। यही प्रायोगिक तार की प्रारंभिक लंबाई L हुई। इसके बाद स्क्रूगेज की सहायता से प्रायोगिक तार के विभिन्न बिंदुओं पर एक दिशा और समकोणिक दिशा में व्यास के पाठ्यांक लेकर तार की औसत त्रिज्या । ज्ञात कर ली जाती है।

अब माइक्रोमीटर-पेंच M की सहायता से स्पिरिट-लेवल के हवा के बुलबुले को बीच में कर लिया जाता है और मुख्य तथा वृत्ताकार स्केल के पाठ्यांक पढ़ लिए जाते हैं। इसके बाद हैंगर S पर आधे किलोग्राम-भार का बाट रख दिया जाता है। इस अतिरिक्त भार के कारण तार A की लंबाई बढ़ती है जिससे फ्रेम C नीचे की ओर जाता है और स्पिरिट लेवल में हवा के बुलबुले की स्थिति बदल जाती है। माइक्रोमीटर पेंच को घुमाकर बुलबुले को पुनः बीच में ले आते हैं तथा माइक्रोमीटर के स्केलों पर के पाठ्यांक ले लिए जाते हैं। इस पाठ्यांक और प्रारंभिक पाठ्यांक के बीच के अंतर से हैंगर पर रखे गए बाट के लिए तार A की लंबाई में वृद्धि ज्ञात हो जाती है। इसी प्रकार आधे-आधे किलोग्राम भार के बाट एक-एक कर रखकर और फिर उसी क्रम में उतारकर पाठ्यांक लिए जाते हैं और प्रत्येक भार के लिए औसत लंबाई में वृद्धि ज्ञात कर ली जाती है।

फिर, सूत्र Y = \frac{MgL}{ пr^{2}l}  की सहायता से यंग-गुणांक का मान निकाल लिया जाता है।

 

  • बल नियतांक (Force Constant)

विभिन्न प्रत्यास्थता गुणांकों (Y, K, η, σ) द्वारा किसी पदार्थ के प्रत्यास्थ गुणों (elastic properties) का ज्ञान हो सकता है, लेकिन इनसे यह पता नहीं किया जा सकता कि दिए गए बल के अधीन त पदार्थ से बने उक्त छड़, तार अथवा स्प्रिंग में कितना विरूपण (distortion) होगा।

यंग का प्रत्यास्था से, F = \frac {Y A Δ L.}{L}

अब, यदि को एक नियतांक k से और प्रसार (elongation) AL को x से व्यक्त किया जाए, तो उपर्युक्त समीकरण का रूप निम्नलिखित होगा

F = kx      ……….(1)

स्पष्टतः, तनाव की स्थिति में किसी वस्तु में सामान्य स्थिति की अपेक्षा अतिरिक्त प्रसार (elongation) उसपर लगनेवाले तनन बल (stretching force) के समानुपाती होता है। हुक का नियम प्रारंभ में इन्हीं शब्दों में दिया गया था, न कि प्रतिबल और विकृति के पदों में।

नियतांक k को जो लगाए गए बल तथा उत्पन्न प्रसार का अनुपात है, बल नियतांक (force constant) कहा जाता है।

बल नियतांक का SI मात्रक Nm^{-1} होता है और इसकी विमाएँ (dimensions) MT^{-2} होती हैं। समीकरण (1) में, यदि x =1 हो, तो F = k.

अतः, एकांक परिमाण का प्रसार उत्पन्न करने के लिए आवश्यक बल का परिमाण संख्यात्मक रूप से बल नियतांक के बराबर होता है।

 

  • तानित तार में प्रत्यास्थ स्थैतिक ऊर्जा –

जब किसी तार पर तनन प्रतिबल आक्षेपित किया जाता है, तो अंत:परमाण्विक बलों के विरुद्ध कार्य किया जाता है। यह कार्य तार में प्रत्यास्थ स्थैतिक ऊर्जा के रूप में संग्रहित हो जाता है। कोई L मूल लंबाई तथा A अनुप्रस्थ परिच्छेद क्षेत्रफल के एक तार की लंबाई के परितः किसी विकृतकारी बल F लगाने पर माना कि लंबाई में | वृद्धि हो जाती है, तब ( यंग गुणांक का समीकरण ) Y = (\frac {F}{A})/(\frac {ΔL}{L}) से हमें F = YA X (1/L) प्राप्त होता है। यहाँ Y तार के पदार्थ का यंग गुणांक है। अब इस तार की लंबाई में अत्यन्त सूक्ष्म dl मात्रा से पुनः वृद्धि कराने के लिए प्रयुक्त कार्य dw का मान Fx dl अथवा YAldl/L होगा। अत: किसी तार को उसकी मूल लंबाई L से L + l तक अर्थात् l = 0 से l = l तक बढ़ाने में किया गया कार्य (W)

= \frac {1}{2} x यंग गुणांक x विकृति^{2} x तार का आयतन

= \frac{1}{2} x प्रतिबल X विकृति X तार का आयतन

यह कार्य तार में प्रत्यास्थ स्थैतिक ऊर्जा (U) के रूप में संग्रहित हो जाती है। अतः तार में पदार्थ की प्रति एकांक आयतन प्रत्यास्थ स्थैतिक ऊर्जा (u) निम्न है –

u = \frac {1}{2} σ ε

 

  • द्रवों की प्रत्यास्थता (Elasticity of liquids) :

द्रवों का अपना कोई विशेष आकार नहीं होता, इसलिए इनकी अनुदैर्घ्य (Longitudinal) और विरूपक (Shearing) विकृति (Strain) नहीं होती है । इनमें केवल आयतन की विकृति (Volume strain) होती है । इसलिए उनमें केवल आयतन की प्रत्यास्थता होती है । चूँकि द्रवों में दाबशीलता (Compressibility) बहुत कम होती है, इसलिए द्रवों का आयतन प्रत्यास्थता-गुणांक बहुत अधिक होता है । पानी का आयतन प्रत्यास्थता-गुणांक 25°C पर 2.12 x 104 न्यूटन प्रति वर्ग मीटर होता है ।

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3 thoughts on “class 11 physics notes pdf in hindi – chapter 9 – ठोसों के यांत्रिक गुण (Mechanical properties of solids)”

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