class 11 physics notes pdf – chapter 8 – Gravitation – गुरुत्वाकर्षण

           chapter – 8  गुरुत्वाकर्षण (GRAVITATION)

 

  • गुरुत्वाकर्षण (GRAVITATION) –

ब्रह्मांड (universe) में प्रत्येक वस्तु दूसरी वस्तु को अपनी ओर आकर्षित (attract) करती है। इस • सर्वव्यापी आकर्षण-बल को गुरुत्वाकर्षण (gravitation) कहा जाता है।

 

  • ग्रह क्या है |

जो पृथ्वी के चारो ओर चक्कर लगाता है उसे ग्रह कहते है , वे आकाशीय पिंड जो ग्रह के चक्कर लगाते है उपग्रह कहते है | उपग्रह दो प्रकार के होते है |

(I)  प्राकृतिक प्रगत उपग्रह

(ii) मानव निर्मित उपग्रह

 

  • केप्लर का नियम (Kepler’s laws) :

सोलहवीं शताब्दी के लगभग डेनमार्क के ज्योतिर्विद (ज्योतिषशास्त का विद्वान) टायको ब्रहेय (Tycho Brahie) ने ग्रहों की स्थितियों के प्रेक्षण (Observation) को दर्ज किया । उनके मरने के बाद उनका शिष्य केप्लर ने उन आँकड़ों (Data) से ग्रह-गति के तीन नियमों को लिखा जो नीचे जैसे हैं

(i) प्रथम नियम (कक्ष का नियम) : प्रत्येक ग्रह दीर्घवृत्त्तीय कक्ष पर चलता है जिसके एक फोकस पर सूर्य रहता है। .

 

(ii) दूसरा नियम (क्षेत्र का नियम) : सूर्य से किसी ग्रह को मिलानेवाली रेखा बराबर समय में बराबर क्षेत्र (Area) तय करती है ।

(iii) तीसरा नियम (परिभ्रमण-काल का नियम) : ग्रह के  परिभ्रमण-काल (Period of revolution) का वर्ग सूर्य से ग्रह की

औसत दूरी के घन के अनुक्रमानुपाती होता है । यदि ग्रह का परिभ्रमण-काल T तथा सूर्य से ग्रह की औसत दूरी r हो, तो

T^{2}  ∝ r^{3}

T^{2} = Kr^{3}

इस नियम से यह स्पष्ट है कि जो ग्रह सूर्य से जितनी अधिक दूर . होता है, उसका परिभ्रमण-काल उतना ही अधिक होता है । ग्रह प्लेटो

सूर्य से सबसे अधिक दूर तथा ग्रह बुध सूर्य से सबसे कम दूर है । इनके परिभ्रमण-काल क्रमशः 7.82 x 109 सेकेण्ड तथा 7.60 x 106 सेकेण्ड है।

 

  • केप्लर के नियमों का स्पष्टीकरण :

केप्लर के नियमों को . भली-भाँति चित्र 6.1 की मदद से समझाया जाता है । दीर्घवृतीय कक्ष ABCDEF पर एक ग्रह वामावर्त दिशा में चक्कर लगाता है । S इस कक्ष का एक फोकस है जिसपर सूर्य स्थित है । ग्रह F से E तक, D से C तक या B से A तक जाने में समान समय 1 सेकेण्ड ही लेता है । साथ-ही इन बिन्दुओं को S से मिलानेवाली रेखाओं के बीच का क्षेत्रफल भी बराबर है । क्षेत्रफल ASB = क्षेत्रफल CSD = क्षेत्रफल ESF । स्पष्ट है कि ग्रह का क्षेत्रीय वेग नियत है । तृतीय नियम से;

T^{2}  ∝ r^{3}

T^{2}  = Kr^{3}

जहाँ K नियतांक है जिसका मान समस्त ग्रहों के लिए समान है।

 

  • न्यूटन का गुरुत्वाकर्षणनियम (Newton’s Law of Gravitation) –

ग्रहों की गति एवं उनपर लगनेवाले बलों के अध्ययन के बाद न्यूटन ने 1686 में यह बताया कि ब्रह्मांड (universe) में प्रत्येक वस्तु दूसरी वस्तु को अपनी ओर आकर्षित (attract) करती है। इस सर्वव्यापी आकर्षण-बल को गुरुत्वाकर्षण (gravitation) कहा जाता है।

न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण-संबंधी निम्नलिखित नियम प्रतिपादित किया, जिसे न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण-नियम कहा जाता है।

किन्हीं दो वस्तुओं के बीच लगनेवाला आकर्षणबल वस्तुओं के द्रव्यमानों के गुणनफल के समानुपाती (directly proportional) तथा उनके बीच की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती (inversely proportional) होता है।

इस बल की दिशा दोनों वस्तुओं को मिलानेवाली रेखा के सीध में होती है।

यदि m_1 तथा m_2 द्रव्यमान की दो वस्तुएँ एक-दूसरी से r दूरी पर स्थित हों, तो इस नियम के अनुसार उनपर क्रियाशील गुरुत्वाकर्षण बल

F ∝ m_{1}m_{2}

F  ∝ \frac {1}{r^{2}}

F  ∝ \frac {m_{1}m_{2}}{r^{2}}

F  ∝ G \frac {m_{1}m_{2}}{r^{2}}

 

जहाँ, G एक नियतांक (constant) है, जिसे गुरुत्वाकर्षण नियतांक (gravitational constant) कहा जाता है। चूँकि इसका मान वस्तुओं की प्रकृति, माध्यम, समय तथा ताप पर निर्भर नहीं करता है, अतः इसे सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियतांक (universal gravitational constant) भी कहा जाता है।

 

  • गुरुत्वाकर्षण नियतांक (Gravitational Constant) G

G को सार्वत्रिक नियतांक कहा जाता है , G को सार्वत्रिक नियतांक (Universal constant) इसलिए कहा जाता है कि इसका मान चुम्बकशीलता (Permeability), चुम्बकीय प्रवृत्ति (Magnetic susceptibility) और दिशा (Direction) पर निर्भर नहीं करता है।

चुम्बकीय एवं विद्युतीय आकर्षण-विकर्षण में इसी तरह का नियतांक रहता है, लेकिन इस नियतांक का मान माध्यम की प्रकृति (Nature of medium) पर निर्भर करता है । लेकिन G का मान माध्यम की प्रकृति पर निर्भर नहीं करता है ।..

न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण नियम से,

F  ∝ G \frac {m_{1}m_{2}}{r^{2}}

G = \frac {Fr_{2}}{m_{1}m_{2}}

यदि m_{1}  = m_{2}  = 1 kg तथा r = 1 m हो, तो

G = F

अतः, गुरुत्वाकर्षण नियतांक संख्यात्मक रूप में (numerically) उस आकर्षण-बल के बराबर होता है जो एकांक दूरी से विलग एकांक द्रव्यमान की दो वस्तुओं पर लगता है।

गुरुत्वाकर्षण नियतांक (G) का SI मात्रक Nm^{2}kg^{-2} होता है तथा इसकी विमाएँ (dimensions) M^{-1}L^{3} T^{-2}  होती हैं। [G का स्वीकृत मान 6.673x10^{-11}  Nm^{2} kg^{-2} है।

 

  • गुरुत्वाकर्षण का सावर्त्रिक नियम –

“इस विश्व में प्रत्येक पिण्ड हर दूसरे पिण्ड को एक बल द्वारा आकर्षित करता है जिसका परिमाण दोनों पिण्डों के द्रव्यमानों के गुणनफल के अनुक्रमानुपाती तथा उनके बीच की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है।”

यह उद्धरण तत्वत: न्यूटन के प्रसिद्ध शोध प्रबन्ध “प्राकृतिक दर्शन के गणितीय सिद्धांत” (Mathematical Principles of Natural Philosophy) जिसे संक्षेप में प्रिंसिपिया (Principia) कहते हैं, से प्राप्त होता है।

गणितीय रूप में न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण नियम को इस प्रकार कहा जा सकता है : किसी बिंदु द्रव्यमान m, पर किसी अन्य बिंदु द्रव्यमान m, के कारण बल F का परिमाण

| F | =   G  x \frac {m_{1}m_{2}}{r^{2}}      ……… (1)

सदिश रूप में समीकरण (1) को इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है

F  =  G x \frac {m_{1}m_{2}}{r^{2}} (\hat {-r})  = –  G \frac {m_{1}m_{2}}{r^{2}} (\hat {r})

= –  G \frac {m_{1}m_{2}}{|r^{3}|} (\hat {r})

यहाँ G सार्वत्रिक गुरुत्वीय नियतांक,r m, से m, तक एकांक सदिश तथा r=I,-1, है जैसा कि चित्र  में दर्शाया गया है।

   ……..(8.3)

चित्र (8.3) , m_{2}  के कारण m_{1}  पर गुरुत्वीय बल के अनुदिश है, यहाँ :, r, (r_{2}  – r_{1}) है।

गुरुत्वीय बल आकर्षी बल है, अर्थात् m_{2}  पर m_{1}  के कारण लगने वाला बल F, – r के अनुदिश है। न्यूटन के गति

के तीसरे नियम के अनुसार, वास्तव में बिन्दु द्रव्यमान m_{1}  पर m_{2}  के कारण बल – F है। इस प्रकार m_{1}  पर m_{2}  के कारण

लगने वाले गुरुत्वाकर्षण बल F_{12}, एवं m_{2}  पर m_{1}  के कारण लगने वाले बल F_{21}, का परस्पर संबंध है,

F_{12}  = -FI_{21}

समीकरण  का अनुप्रयोग, अपने पास उपलब्ध पिण्डों __ पर कर सकने से पूर्व हमें सावधान रहना होगा, क्योंकि यह

नियम बिन्दु द्रव्यमानों से संबंधित है, जबकि हमें विस्तारित पिण्डों, जिनका परिमित आमाप होता है, पर विचार करना है। यदि हमारे पास बिन्दु द्रव्यमानों का कोई संचयन है, तो उनमें से किसी एक पर बल अन्य बिन्दु द्रव्यमानों के कारण गुरुत्वाकर्षण बलों के सदिश योग के बराबर होता है जैसा कि चित्र (8.4) में दर्शाया गया है।

  ………(8.4)

 

  • जड़त्वीय और गुरुत्वीय द्रव्यमान (Inertial and Gravitational Mass) जड़त्वीय द्रव्यमान (Inertial mass)-

न्यूटन के गति-संबंधी दूसरे नियम (F = ma) से हमें यह पता चलता है कि भिन्न-भिन्न द्रव्यमान वाली वस्तुओं पर समान त्वरण उत्पन्न करने के लिए उनपर भिन्न-भिन्न परिमाण के बल लगाने पड़ते हैं। इस प्रकार, एक-ही त्वरण उत्पन्न करने के लिए अधिक द्रव्यमान की.वस्तु पर अधिक बल और कम द्रव्यमान की वस्तु पर कम बल लगाना पड़ेगा। स्पष्ट है कि वस्तु को विराम से त्वरित गति प्रदान करने के लिए आवश्यक बल उसके द्रव्यमान पर निर्भर करेगा। चूँकि, विरामावस्था से गतिमान अवस्था में लाने के लिए आवश्यक बल वस्तु के जड़त्व (inertia) का बोध कराता है, इसलिए वस्तु के इस प्रकार परिभाषित द्रव्यमान को जड़त्वीय द्रव्यमान (inertial mass) कहते हैं। इसे इस प्रकार भी कह सकते हैं कि वस्तु का जड़त्व उसके द्रव्यमान से मापा जाता है।

गुरुत्वीय द्रव्यमान (Gravitational mass)-गुरुत्वाकर्षण के अनुसार किसी वस्तु का पृथ्वी के केंद्र की ओर गुरुत्वीय बल (gravitational force), उस वस्तु के भार (weight) के बराबर होता है। यदि वस्तु का भार W और उसका द्रव्यमान m है, तो

W = mg

या

m = \frac {W}{g} इस द्रव्यमान (m) को वस्तु का गुरुत्वीय द्रव्यमान कहते हैं। इसका मान सीधे भौतिक तुला से मापा जाता है। इसका मान सभी स्थान पर समान होता है। यदि किसी वस्तु को चंद्रमा पर ले जाया जाए तो भले ही वस्तु का भार (चंद्रमा की सतह पर g का मान कम होने के कारण) कम हा जाएगा. परंतु उसका गुरुत्वीय द्रव्यमान वही रहेगा।

जडत्वीय द्रव्यमान तथा गुरुत्वीय द्रव्यमान के मान और मात्रक (unit) समान होते हैं।

 

  • गुरुत्वाकर्षण और गुरुत्व में अंतर स्पस्ट करे या गुरुत्वाकर्षण और गुत्व से आप क्या समझते है ?

किन्हीं दो पिण्डों के बीच आकर्षण बल को ‘गुरुत्वाकर्षण’ कहते हैं । पृथ्वी और एक अन्य पिण्ड के बीच आकर्षण बल को ‘गुरुत्व’ कहते हैं।

 

  • गुरुत्वीय क्षेत्र तथा गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता

(Gravitational field and intensity of gravitat-ional field):

गुरुत्वीय क्षेत्र :-

एक कण के चारों ओर का स्थान जिसपर कण का आकर्षण बल कार्य करता है, उस स्थान को उस कण का गुरुत्वीय क्षेत्र कहते हैं । परिभाषा से यह प्रतीत होता है कि गुरुत्वीय क्षेत्र किसी कण के कारण अनन्त तक फैला हुआ होता है । परन्तु व्यवहार में ऐसी बात नहीं पायी जाती है । किसी कण के कारण गुरुत्वीय क्षेत्र सीमित है ।

गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता :-

गुरुत्वीय क्षेत्र के किसी बिन्दु पर स्थित एकांक द्रव्यमान पर क्रियाशील आकर्षण बल उस बिन्दु पर गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता कहलाती है ।

गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता की विमा LT^{-2}  है ।

गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता का मात्रक परिभाषा के अनुसार न्यूटन प्रति किग्रा तथा विमा के अनुसार मी से^{-2}  है ।

 

  • गुरुत्वीय विभव क्या है | (Gravitational potential) : .

‘गुरुत्वीय क्षेत्र की किसी बिन्दु पर गुरुत्वीय विभव उतने कार्य को कहते हैं जितना कार्य एकांक द्रव्यमान को अनन्त से उस बिन्दु तक लाने में करना पड़ता है । इसे प्रायः V से निरूपित किया जाता है ।

यह एक अदिश राशि है । इसकी विमा LT^ {- 2} है तथा इसका मात्रक जूल/किग्रा है।

[LT^{-2}] = मी^{2}  से ^{-2}  = किग्रा मी से^{-2}  मी/किग्रा

= न्यूटन मी/किग्रा = जूल/किग्रा

.:.  किग्रा मी से^{- 2}  = द्रव्यमान * त्वरण = बल = न्यूटन

और

न्यूटन मी = कार्य के मात्रक  = जुल

 

  • गुरुत्वीय विभव तथा गुरुत्वीय तीव्रता में संबंध :

गुरुत्वीय क्षेत्र में अगर दो बिन्दुओं के बीच की दूरी dr तथा इनके बीच की दुरी गुरुत्वीय तीव्रता का मान F है तो एक बिन्दु से दूसरे दिन एकांक द्रव्यमान को ले जाने में किया गया कार्य = F.dr वि परिभाषा के अनुसार दोनों बिन्दुओं के बीच विभवान्तर (Potential difference)

dV = Fdr होता है ।

F= \frac {dv}{dr}  = \frac {d}{dr}  (विभव)

अतः किसी बिन्दु पर गुरुत्वीय तीव्रता गुरुत्वीय विभव के अवकलन (Differentiation) के बराबर होता है।

 

  • गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा (Gravitational Potential Energy)

प्रत्येक वस्तु का अपने द्रव्यमान के कारण गुरुत्वीय क्षेत्र होता है तथा इस क्षेत्र में स्थित अन्य सभी वस्तुएँ आकर्षण-बल का अनुभव करती हैं। इसी आकर्षण-बल के कारण दो वस्तुओं के निकाय की स्थितिज ऊर्जा होती है। जब दो वस्तुएँ एक-दूसरी से अनंत दूरी पर स्थित रहती हैं, अर्थात एक वस्तु दूसरी वस्तु के गुरुत्वीय क्षेत्र के बाहर रहती है, तो निकाय की स्थितिज ऊर्जा को शून्य माना जाता है। परंतु, वस्तुओं को एक-दूसरी के निकट लाने में आकर्षण-बल के कारण यांत्रिक काय संपादित होता है। चूँकि यह कार्य गुरुत्वीय क्षेत्र द्वारा किया जाता है, अतः निकाय की स्थिातज ऊर्जा (जिसका प्रारंभ में मान शून्य है) में ह्रास होता है और यह शून्य से घटकर ऋणात्मक ही जाती है।

दो वस्तुओं के बीच गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा वह यांत्रिक कार्य है जो किसी एक वस्तु को दूसरी वस्तु के गुरुत्वीय क्षेत्र में अनंत से निर्दिष्ट स्थान (assigned position) तक लाने में किया जाता है।

 

  • गुरुत्वीय विभव तथा गुरुत्वीय तीव्रता में संबंध :

गुरुत्वीय क्षेत्र में अगर दो बिन्दुओं के बीच की दूरी dr तथा इनके बीच की दुरी गुरुत्वीय तीव्रता का मान F है तो एक बिन्दु से दूसरे दिन एकांक द्रव्यमान को ले जाने में किया गया कार्य = F.dr वि परिभाषा के अनुसार दोनों बिन्दुओं के बीच विभवान्तर (Potential difference)

dV = Fdr होता है ।

F= \frac {dv}{dr}  = \frac {d}{dr}  (विभव)

अतः किसी बिन्दु पर गुरुत्वीय तीव्रता गुरुत्वीय विभव के अवकलन (Differentiation) के बराबर होता है।

मान लिया की m_{1}, m_{2}   द्रव्यमान की दो वस्तुओं के बीच की दुरी  r  है | इस निकाय की गुरुत्वीय स्तिथीज़ ऊर्जा E_{P}[latex] ज्ञात करने के लिए किसी एक वस्तु (मान लिया कि [latex]m_{1}) को स्थिर जानकर दूसरी वस्तु अर्थात m_{2}  को अनंत से निर्दिष्ट बिंदु तक लाने में किया गया कुल यांत्रिक कार्य निकालना होगा

विस्थापन  के क्रम में मान लिया कि किसी समय द्रव्यमान m_{2}  बिंदु B पर है जहाँ PB = x, अतः m_{1}, के कारण m_{2}  पर क्रियाशील आकर्षण-बल F = G \frac {m_{1}m_{2}}{x^{2}}   जिसकी दिशा B से P की  ओर होगी। अब m_{2}  को अल्प विस्थापन BC = dx देने में किया गया कार्य

dW = Fdx = G \frac {m_{1}m_{2}dx}{x^{2}}

इस प्रकार m_{2}  को अनंत से A तक लाने में किया गया कुल कार्य

परिभाषा के अनुसार यांत्रिक कार्य का यह परिमाण निकाय की स्थितिज ऊर्जा E, होगी, अर्थात

E_{p}  = - G \frac {m_{1}m_{2}}{r}

NOTE :-  दो द्रव्यमानों के बीच अनंत दूरी रहने पर गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा शून्य होती है, परंतु र परिमित (finite) दूरी पर निकाय की स्थितिज ऊर्जा ऋणात्मक (negative) होती है।

 

  • द्रव्यमान m के कारण किसी बिंदु p पर गुरुत्वीय विभव का व्यंजक प्राप्त करे -

माना  बिंदु A पर m द्रव्यमान का कोई पिंड स्तिथ है जिससे r दुरी पर कोई बिंदु p है जहाँ गुत्वीय विभव का व्यंजक प्राप्त करना है | पिंड A के कारन p बिंदु पर गुरुत्वीय विभव का व्यंजक प्राप्त करने आकर्षण बल के लिए माना p बिंदु एकांक द्रव्यमान की वस्तु स्तिथ है | इसके लिए p बिंदु अनंत तक बढ़ाई जाती है  जिसके बीच का बिंदु p_{1},p_{2},p_{3}.......p_{n}  है तथा बिंदु A से p_{n}  को क्रमशः r_{1},r_{2},r_{3}......... r_{n}  है | अतः m द्रव्यमान कारण बिंदु पर लगनेवाला बल

F = m

F = G \frac {m}{r_{1}^{2}}

m द्रव्यमान के कारण p_{2}  बिंदु पर लगने  वाला आकर्षण बल

f = F = G \frac {m}{r_{2}^{2}}

n द्रव्यमान के काऱण p_{n}-1   बिंदु पर लगने वाला आकर्षण बल

f = G \frac {m}{({m-1})^{2}}

m द्रव्यमान के काऱण p_{n}   बिंदु पर लगने वाला आकर्षण बल

f = f = F = G \frac {m}{r^{2}}

चूंकि P और P_{1}  बिन्दु एक-दूसरे के बहुत-बहुत निकट है, इसलिए दोनों बिन्दुओं के बीच औसत आकर्षण बल का मान उनके गुणोत्तर औसत (Geometrical mean) के बराबर है । यानि P_{1}  और P_{2}  के बीच

औसत बल –

अब एकांक द्रव्यमान को P_{1}  से P तक लाने में किया गया कार्य

G\frac {m}{r r_{1}}(r_{1} – r)  = Gm (\frac {1}{r} - \frac {1}{r_{1}}

इस तरह एकांक द्रव्यमान का P_{2} से P_{1} तक लाने में किया गया कार्य

Gm (\frac {1}{r_{1}}  - \frac {1}{r_{2}}   )

इस तरह एकांक द्रव्यमान को P_{n} से P_{n-1} तक लाने में किया गया कार्य

= Gm(\frac {1}{r_{n – 1}}  – \frac {1}{r_{n}})

सबों को जोड़ने पर एकांक द्रव्यमान को P_{n} से P तक लाने में किया गया कार्य

= Gm (\frac {1}{r}  – \frac {1}{r_{n}})

P बिन्दु पर के विभव के लिए P_{n} बिन्दु अनन्त पर रहता है ।

अत: AP_{n}  = r_{n}  = ∞ इसलिए  \frac {1}{r_{n}}  = \frac {1}{∝}  = 0

P बिन्दु पर गुरुत्वीय विभव = Gm (\frac {1}{r} – 0) = \frac {Gm}{r}

परिभाषा से इसका चिह्न ऋणात्मक है; इसलिए P  बिन्दु पर गुरुत्वीय विभव

V = - \frac {Gm}{r}

ऋणात्मक चिह्न इसलिए लगता है कि गुरुत्वीय विभव का मान अनन्त पर शून्य होता है । लिखने में ऋणात्मक चिह्न को पाय: छोड़

दिया जाता है लेकिन इस बात को हमेशा ध्यान में रखना  चाहिए कि वहाँ ऋणात्मक चिह्न है ।

 

  • गुरुत्वीय त्वरण (Acceleration due to Gravity) (g) -

पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में स्थित वस्तुओं पर लगनेवाले बल को गुरुत्व बल या केवल कहा जाता है। इसी बल को वस्तु का भार (weight) भी कहते हैं और कुछ ऊँचाई से पथ्वी को गिरनेवाली सभी वस्तुओं की गति में इसी बल, अर्थात गुरुत्व के कारण त्वरण उत्पन्न होता है। त्वरण को गुरुत्वजनित त्वरण अथवा गुरुत्वीय त्वरण (acceleration due to gravity) कहा जाता है तथा इसे g से निरूपित किया जाता है।

 

  • G तथा g के बीच संबंध (Relation between G and g) गुरुत्वीय त्वरण (Acceleration due to Gravity), गुरुत्वाकर्षण नियतांक (Gravitational Constant) G के बीच संबंध -

यदि पृथ्वी को द्रव्यमान M तथा त्रिज्या R का एक एकसमान ठोस गोला (uniform solid sphere) मान लें, तो इसकी सतह पर स्थित द्रव्यमान m की किसी वस्तु पर लगनेवाले आकर्षण-बल का परिमाण

F = G \frac {mM}{R^{2}}

परंतु, यह बल F वस्तु का भार है, अर्थात F = mg.

अतः, \frac {GmM}{R^{2}}  = mg

या  g = \frac {GM}{R^{2}}

उपर्युक्त समीकरण से यह स्पष्ट है कि गुरुत्वीय त्वरण g का मान पृथ्वी के द्रव्यमान M तथा उसकी त्रिज्या R के पदों में व्यक्त होता है तथा इसका, अर्थात g का मान वस्तु के द्रव्यमान से स्वतंत्र है। अतः, हवा का प्रतिरोध नगण्य रहने पर गुरुत्व के अधीन गिरनेवाली सभी वस्तुओं के त्वरण समान होते हैं।

 

  • गुरुत्वीय त्वरण 'g' का परिवर्तन (Variation of Acceleration due to Gravity 'g') -

यदि पृथ्वी को द्रव्यमान M तथा त्रिज्या R का एक ठोस गोला मान लें, तो उसकी सतह पर गुरुत्वीय त्वरण g का मान निम्नलिखित समीकरण से दिया जाता है

g = \frac {GM}{R^{2}}                    .......(1)

गुरुत्वीय त्वरण g का परिवर्तन निम्नलिखित विभिन्न कारणों से होता है

(a) पृथ्वी के पृष्ठ के ऊपर गुरुत्वीय त्वरण g   (Variation of g due to altitude) –

पृथ्वी की सतह से h ऊँचाई पर (चित्र) स्थित द्रव्यमान m की किसी वस्तु पर पृथ्वी के कारण आकर्षण-बल

F = G \frac {Mm}{(R + h)^{2}}

यदि h ऊँचाई पर गुरुत्वीय त्वरण का मान g_{1}  हो, तो

F = mg_{1}

Mg_{1} = \frac {GMm}{(R + h )^{2}}

या

g_{1} = \frac {GM}{(R + h )^{2}}             .............(2)

परंतु, समीकरण (1) से,

g = \frac {GM}{R^{2}}

\frac {g_{1}}{g}  = \frac {GM}{(R + h)^{2}}  * \frac {R^{2}}{GM}  = \frac {R^{2}}{(R + h)^{2}}

या

g_{1}  = \frac {gR^{2}}{(R + h)^{2}}  = \frac {g}{(1 + \frac {h}{R})^{2}}      ............(3)

स्पष्टतः, ऊँचाई h के बढ़ने के क्रम में गुरुत्वीय त्वरण (g_{1}) का मान घटता जाता है।

[यदि h < R, तो समीकरण (1) से,

g_{1} = g (1 - \frac {2h}{R})

 

(b) पृथ्वी  के पृष्ठ के निचे  गुरुत्वीय त्वरण g (Variaton of g with depth) -

यदि पृथ्वी की सतह के नीचे d गहराई पर m द्रव्यमान की कोई वस्तु रखी हो, तो इसपर केवल (R-d) त्रिज्या की भीतरी गोले, भाग I, का आकर्षण-बल कार्य करेगा (चित्र )। चूँकि गोलीय खोल (spherical .. shell) के भीतर किसी बिंदु पर गुरुत्वाकर्षण बल शून्य होता है , अतः पृथ्वी के भाग II के कारण द्रव्यमान m पर आकर्षण बल शून्य होगा। अब भाग I का द्रव्यमान M_{1} = \frac {4}{3} π(R-d)^{3}p, जहाँ p पृथ्वी का माध्य घनत्व (average density) है। अतः, इस वस्तु पर पृथ्वी का आकर्षण-बल

F = \frac {GM_{1}m}{(R-d)^{2}}  =  G \frac {4}{3} ΠGpm(R – d)

परंत, F = mg_{2}, जहाँ g_{2}  पृथ्वी की सतह से d गहराई (depth) पर गुरुत्वीय त्वरण है।

अतः, mg_{2}  =  \frac {4}{3} FrGpm(R-d)

या

g_{2}  =  \frac {4}{3} ΠGp(R – d)  = \frac {4}{3}ΠG  \frac {M}{\frac {4}{3}ΠR^{3}}    :- p = \frac { पृथ्वी का द्रव्यमान}{ उसका आयतन}

= \frac {GM}{R^{2}}(\frac {R-d}{R})

g_{2} = g (1 - \frac {d}{R})                 ............(1)                 :: g = \frac {GM}{R^{2}}

स्पष्टतः पृथ्वी की सतह के नीचे जाने के क्रम में गुरुत्वीय त्वरण एकघातीय रूप से flinearly) घटता जाता है और इसका मान । पथ्वी के केंद्र से दूरी, अर्थात (R-d) के

मानपाती होता है। पृथ्वी के केंद्र पर d = R, अतः समीकरण (1) से पृथ्वी के केंद्र पर g का मान शून्य होगा।

g का मान पृथ्वी की सतह पर महत्तम होता है तथा ऊँचाई (altitude) और गहराई (depth) के साथ इसका मान घटता जाता है। Distance from पृथ्वी के केंद्र से दूरी के साथ g का परिवर्तन earth's centre (variation) चित्र  में दिखाया गया है।

 

  • उपग्रह (Satellites) -

जिस प्रकार विभिन्न ग्रह (planets) सूर्य के चारों ओर Satellite अपनी कक्षाओं (orbits) में परिक्रमण करते रहते हैं उसी प्रकार कुछ आकाशीय पिंड (celestial bodies) भी इन ग्रहों के चारों ओर अपनी कक्षा में चक्कर लगाते रहते हैं। किसी ग्रह के चारों ओर घूमनेवाले आकाशीय पिंड को उसका उपग्रह (satellite) कहा जाता है।

उदाहरण के लिए, चंद्रमा पृथ्वी का प्राकृतिक उपग्रह (natural satellite) है। - आर्यभट्ट, भास्कर, रोहिणी, ऐपल (APPLE) इनसेट (INSAT) 1 A, 1 B, 2B आदि कृत्रिम उपग्रहों के कुछ उदाहरण हैं।

  • उपग्रह का कक्षीय वेग (Orbital Velocity of the Satellite) -

मान लिया कि पृथ्वी M द्रव्यमान तथा R त्रिज्या का एक समांगी गोला (homogeneous sphere) है जिसके चारों ओर r त्रिज्या की वृत्तीय कक्षा (circular orbit) में द्रव्यमान m का एक उपग्रह, कक्षीय वेग (orbital velocity) V से घूम रहा है (चित्र 9.20)। वृत्तीय कक्षा के लिए आवश्यक

अभिकेंद्र बल (centripetal force) \frac {mV^{2}o}{r} पृथ्वी द्वारा उपग्रह पर लगनेवाले गुरुत्वीय आकर्षण F = G[latex]\frac {mM}{{r}^{2}}  से प्राप्त होता है। अतः,

\frac {mv^{2}_{0}}{r}  = \frac {GMm}{r^{2}}

या  v_{0}  = \sqrt {GM}{r}              .........(1)

या v_{0}  = \sqrt {GM}{R + h}    .............(2)

जहाँ h, उपग्रह की पृथ्वी की सतह से ऊँचाई है। उपर्युक्त समीकरण से स्पष्ट है कि उपग्रह का कक्षीय वेग उपग्रह के द्रव्यमान m पर निर्भर नहीं करता, बल्कि कक्षा की त्रिज्या । पर निर्भर करता है। कक्षा की त्रिज्या जितनी अधिक होगी, उपग्रह का वेग उतना ही कम होगा।

अब समीकरण  से, GM = gR^{2}  रखने पर,

V_{0}  = \sqrt {g R^{2}}{r}  = \sqrt[n] {g R^{2}}{R + h}          ..........(3)

यदि उपग्रह पृथ्वी की सतह के बहुत समीप हो अर्थात h << R, तो R की तुलना में h को नगण्य (negligible) मान लेने पर

V_{0}  = \sqrt {gR}         ..........(4)

अतः, पलायन वेग (v_{e}) तथा कक्षीय वेग (v_{0}) का अनुपात

\frac {v_{e}}{v_{0}}  =\sqrt {2gR}{gR}  = \sqrt[n] {2} : 1       ..............(5)

उपग्रह का परिकमण-काल T = \frac {एक परिक्रमण में तय की गई दरी}{ कक्षीय वेग}

T = \frac {2 π R}{V_{0}}  =  \frac {2 π R}{\sqrt[n] {gR}}  = 2 π \sqrt[n] {\frac {R}{g}}

 

  • भूस्थिर उपग्रह (Geostationary Satellite) – (भू उपग्रह) -

कोई उपग्रह पृथ्वी की सतह से जितनी दूर होता है, उसका परिक्रमण-काल उतना ही अधिक होता है। उदाहरणार्थ, चंद्रमा, जो पृथ्वी से 380,000 km दूर है, पृथ्वी का एक परिक्रमण लगभग 27.3 दिनों में पूरा करता है। लेकिन पृथ्वी के निकट एक कृत्रिम उपग्रह एक दिन में 10 से 20 परिक्रमण तक पूरा कर लेता है।

परिभाषा –

यदि पृथ्वी की सतह से किसी कृत्रिम उपग्रह की ऊँचाई इतनी हो कि इसका परिक्रमण काल ठीक (exactly) पृथ्वी की अक्षीय गति (axial speed) के परिक्रमण-काल, अर्थात 24 घंटे के बराबर हो तथा वह पृथ्वी के घूर्णन की दिशा में परिक्रमण कर रहा हो तो उपग्रह पृथ्वी के सापेक्ष एक ही स्थान के ऊपर स्थिर दिखाई देगा यद्यपि पृथ्वी तथा उपग्रह दोनों गतिमान हैं। ऐसे उपग्रह को भूस्थिर उपग्रह (geostationary satellite) (भू उपग्रह) कहा जाता है |

तथा इसकी कक्षा को पार्क कक्षा (parking orbit) कहा जाता है। भारतीय उपग्रह इनसेट 18, 2B आदि भूस्थिर उपग्रह है |

इस प्रकार के उपग्रहों का उपयोग दूरदर्शन संकेतों (TV signals) को करके दरदर्शन कार्यक्रम विश्व के एक भाग से दूसरे भाग तक लगातार संचारित करने में किया जाता है है। अतः, इन्हें संचार-उपग्रह (communication satellite) भी कहा जाता है। यह

है कि संचार-उपग्रह की वृत्तीय कक्षा पृथ्वी के विषुवतीय तल (equatorial plane) में हो।

उपग्रह का व्यवस्था प्रचालन (schematic operation) चित्र  में प्रदर्शित है।

 

  • कृत्रिम उपग्रह क्या है | वास्तविक भारहीनता से क्या समझते है |

मानव निर्मित उपग्रह कृत्रिम कहलाता है | जडवतीय निर्देश तंत्र से स्पस्ट है की वस्तु का कुल भार कुल गुरुत्वाकर्षण बल के बराबर होता है एवं यह गुरुत्वाकर्षण वस्तु का वास्तविक भार कहलाता है , जब वस्तु के ऊपर लगने वाला गुरुत्वाकर्षण बल का मान शुन्य हो जाये  तो वस्तु का भार शुन्य हो जाता है शुन्य भार किसी वस्तु की वास्तविक भारहीनता कहलाता है |

 

  • भारहीनता ( Weightlessness)

जब हम किसी तल पर खड़े होते हैं तो हमारा भार (W = mg) तल पर ऊर्ध्वाधरतः नीचे की ओर लगता है तथा तल द्वारा हमारे पैरों पर ऊपर की ओर लगनेवाली W=mg प्रतिक्रिया R के कारण हम अपने भार का अनुभव करते हैं। यदि किसी विशेष परिस्थिति में प्रतिक्रियात्मक बल शून्य हो जाए, तो वस्तु का भार शून्य प्रतीत होगा। इसे भारहीनता की अवस्था कहा जाता है।

(i) जब व्यक्ति लिफ्ट के अंदर खड़ा है और लिफ्ट विराम की स्तिथि में है इस अवस्था में व्यक्ति का भार mg अभिलम्ब प्रत्रिकीया R के बराबर होता है | अर्थात

R = mg

इसे दूसरे शब्दों में कह सकते है की विराम की स्तिथि में स्तिथ लिफ्ट व्यक्ति को व्यक्त भार और वास्तविक भार का मान बराबर होता है |

(ii) जब कोई व्यक्ति लिफ्ट के अंदर हो और लिफ्ट a समरूप त्वरण से ऊपर की ओर गतिशील हो इस स्तिथि में व्यक्ति का भार mg निचे की ओर कार्य करता है |

यदि आदमी का त्वरण ऊपर वर्ग और क्रियाशील है तो ,

R = mg = ma

R = mg = ma

या

R = mg ( 1 + \frac {a}{g})

(iii) जब कोई व्यक्ति लिफ्ट में खड़ा है और लिफ्ट a त्वरण से निचे की ओर आ रहा है इस स्तिथि में आदमी का भार mg निचे की ओर तथा अभिलम्ब प्रतिक्रिया बल ऊपर की ओर क्रियाशील होती है यदि आदमी का त्वरण वही , तो

R = mg

R + mg = ma

या

R = ma – mg

= mg (\frac {a – 1}{g})

ऐसी स्तिथि में व्यक्त भार मनुस्य के असल भार से कम होता है | जब लिफ्ट की रस्सी ऐसी स्तिथि में टूटती है , तो ऐसी स्तिथि में लिफ्ट मुक्त पिंड की भाँती g त्वरण से निचे गिरती है | ऐसी दशा में  a = g अर्ताथ आदमी का व्यक्त भार = mg (1-\frac {a}{g})के तुल्य होगा जो शुन्य के बराबर होता है यह स्तिथि भारहीनता की स्तिथि कहलाती है |

 

  • भारहीनता के असर को लिखे –

(1) पृथ्वी पर स्थित मानव खाना खाते हैं तो कंठ के नीचे गुरुत्व बल से खाया पदार्थ खींच लिया जाता है । परंतु कृत्रिम उपग्रह के अंदर मानव को खाना खाने में दिक्कत होती है । -

(2) एक गिलास में रखा पानी पृथ्वी पर उलटने पर गिर जाता है । पर उपग्रह में गिलास उलट देने पर पानी नहीं गिरता ।

(3) उपग्रह के अंदर आर्कमिडीज का उत्प्लावन बल (Buoyany force) नहीं लगता ।

(4) उपग्रह के अंदर ऊपर-नीचे का भेद नहीं है । वस्तु को छोड़ देने पर वह नीचे नहीं गिरता ।

(5) उपग्रह के अंदर सरल दोलक घड़ी बंद हो जाती है।

(6) उपग्रह के अंदर अगर आप थूक फेकेंगे तो आपको लगेगा और पश्च वेग (Recoil velocity) प्राप्त होगा।

 

  • पलायन वेग (Escape velocity) :

किसी ग्रह (planet)  या आकाशीय पिंड (celestial body) के गुरुत्वाकर्षण  के प्रभाव से भाग जाने (escape) मात्र के लिए जितना न्यूनतम वेग (minimum velocity) आवश्यक होता है वही उस ग्रह या आकाशीय पिंड के लिए पलायन वेग कहलाता है।

पृथ्वी से यदि हम एक पत्थर ऊपर फेंके तो वह ऊपर जाकर लौट आता है । यदि वेग और बढ़ायें तो यह और ऊँचा जाता उच्चतम बिंदु पर वेग शून्य हो जाता है, परंतु गुरुत्व बल वहाँ लग रहा होता है । इस बल के कारण वस्तु वापस आती है । अब हम जोर से फेंके कि वस्तु अनन्त ऊँचाई पर चली जाय, और रुके, तो वापस आयेगी या नहीं?  नहीं आयेगी, क्योंकि अनन्त ऊँचाई गुरुत्वाकर्षण शून्य हो जायेगा । इस वेग से फेंके जाने पर या दर अधिक वेग से फेंके जाने पर वस्तु पृथ्वी से पलायन (Escape) कर  जायेगी।

इसी प्रकार चाँद से वस्तु फेंकी जाय तो कम वेग रहने पर चाँद पर ही गिर जायेगी, परंतु काफी वेग रहने पर वह चाँद से भाग जायेगी । आखिर कितना वेग देने पर ये घटनाएँ घटेगी ?

  • पलायन वेग की गणना (Calculation of the escape velocity) –

यटि पृथ्वी R त्रिज्या तथा M द्रव्यमान का एक समांगी (homogeneous) ठोस गोला मान लें, तो m द्रव्यमान किसी वस्तु को दी गई कुल गतिज

\frac {1}{2}mv_{e}^{2} (जहाँ वस्तु का पलायन वेग है ) उसे अनंत तक पहुँचाने के लिए पर्याप्त होगी।

पृथ्वी की सतह पर वस्तु की गतिज ऊर्जा ( E_{k} ) = \frac {1}{2}mv_{e}^{2}   तथा स्थितिज ऊर्जा (E_{p}) = - G \frac {Mm}{R}

.:   कुल ऊर्जा = E_{k}  + E_{p}  =( \frac {1}{2}mv_{e}^{2}  ) – (\frac {GMm}{R})

चूँकि अनंत पर वस्तु की गतिज ऊर्जा पूर्णतः स्थितिज ऊर्जा के महत्तम मान, अर्थात रूपांतरित हो जाती है, अतः पृथ्वी से अनंत दूरी पर वस्तु की

गतिज ऊर्जा (E_{K}) = 0, स्थितिज ऊर्जा (E_{P}) = 0

.:.  कुल ऊर्जा = गतिज ऊर्जा + स्थितिज ऊर्जा = 0

ऊर्जा-संरक्षण के सिद्धांत से पृथ्वी की सतह तथा अनंत पर कुल ऊर्जा का मान अचर (constant) रहता है।

अतः,

\frac {1}{2}mv_{e}^{2}  – \frac {GMm}{R}  = 0

या

\frac {1}{2}mv_{e}^{2}   =  \frac {GMm}{R}

या

V_{e}  = \sqrt {\frac {2GM}{R}}         .............. (1)

 

चूँकि समीकरण g = \frac {GM}{R^{2}} से,

 

अतः, GM का मान समीकरण (1) में रखने पर,

 

V_{e} = [latex]\sqrt {\frac {2gR^{2}}{R}}

 

V_{e} = \sqrt {2gR}

 

  • चंद्रमा पर वायुमंडल क्यों नहीं है ?

चंद्रमा का ताप सूर्य की गर्मी से अधिक उच्च हो जाता है । इसके कारण वहाँ गैसीय पदार्थों की चाल इतनी बढ़ जाती है कि चंद्रमा पर पलायन वेग के मान 2.4 kms^{-1} से अधिक मान गैस-अणु का हो जाता है । इसलिए गैस-अणु पलायन कर जाते हैं । इस कारण वहाँ वायुमंडल नहीं है।

 

  • कृष्ण विवर (Black hole) -

अत्यधिक आपसी गुरुत्वाकर्षण बल के कारण पिंड सिकुड़ता है । द्रव्यमान समान रहे एवं त्रिज्या घटे तो पलायन वेग का मान बढ़ता है। क्योंकि

V_{e}  = \sqrt {GM}{R}

इस क्रम में एक ऐसी स्थिति आती है कि पलायन चाल का मान प्रकाश की चाल 3 x 10^{8} ms^{ -1} से अधिक हो जाता है । ऐसी स्थिति में प्रकाश पिंड पर जाता तो है लेकिन गुरुत्व बल को पार कर वापस हमारी ओर नहीं आ पाता । अतः, यह पिंड 'काला' या कृष्ण कहा जाता है । गुरुत्वीय आकर्षण से बने इस घने पिंड को कृष्ण विवर (Black hole) कहते हैं । कृष्ण विवर के लिए

\sqrt {\frac {GM}{R}}  ≥ 3 Ⅹ 10^{8}

तारों के जीवन में कृष्ण विवर उनकी मृत्यु की अवस्था के रूप में आता है । उस समय तारे में केवल न्यूट्रॉन ही रह जाते हैं । इन न्यूट्रॉन से बने तारे को न्यूट्रॉन स्टार कहते हैं । कृष्ण विवर के चारों ओर तारे चक्कर लगाते हैं । यदि कोई तारा चक्कर लगा रहा हो और केन्द्र पर अंधेरा हो तो हम अनुमान करते हैं कि वहाँ कृष्ण विवर है।

 

  • दुरी संवेदी उपग्रह क्या है |

दूर संवेदी उपग्रह को सूर्य सम्बद्ध उपग्रह कहते है वह उपग्रह जो पृथ्वी के किसी खास स्थान के ऊपर से होकर एक निश्चित समय से गुजरता है

जैसे -  I RS – IA , IRS – IB

यह किसी कक्षा भूमध्य तल में होना जरुरी नहीं होता है |

 

  • तुल्यकाली उपग्रह -

वे  उपग्रह जो पृथ्वी के विषुवत वृत्त के तल (अर्थात निरक्षीय समतल) में पृथ्वी के परितः वृत्तीय कक्षा में, T= 24 घन्टे के आवर्तकाल से, परिक्रमण करते हैं, तुल्यकाली उपग्रह कहलाते हैं। स्पष्ट है कि क्योंकि पृथ्वी समान आवर्तकाल से अपने अक्ष __ पर घूर्णन करती है अतः यह उपग्रह पृथ्वी के किसी भी बिन्दु से स्थिर प्रतीत होगा। पृथ्वी के पृष्ठ से इतनी अधिक ऊँचाई तक ऊपर फेंकने के लिए अत्यन्त शक्तिशाली रॉकेटों की आवश्यकता होती है।

  • ध्रुवीय उपग्रह -

ये निम्न तुंगता (h = 500 से 800 km) उपग्रह हैं। परन्तु ये पृथ्वी के ध्रुवों के परितः उत्तर दक्षिण दिशा में गमन करते हैं जबकि पृथ्वी अपने अक्ष पर पश्चिम से पूर्व की ओर घूर्णन करती है।  चूंकि इन उपग्रहों का आवर्तकाल लगभग 100 मिनट होता है, अतः ये किसी भी अक्षांश से दिन में कई बार गुजरते हैं। तथापि, क्योंकि इन उपग्रहों की पृथ्वी के पृष्ठ से ऊँचाई लगभग 500-800 km होती है, अत: इस पर लगे किसी कैमरे द्वारा किसी एक कक्षा में केवल पृथ्वी की एक छोटी पट्टी का ही दृश्य लिया जा सकता है। संलग्न पट्टियों को अगली कक्षा में देखा जाता है। इस प्रकार प्रभावी रूप में पूरे एक दिन में पट्टी दर पट्टी पूरी पृथ्वी का सर्वेक्षण किया जा सकता है। ये उपग्रह निकट से, अच्छे विभेदन के साथ, विषुवतीय तथा ध्रुवीय क्षेत्रों का सर्वेक्षण कर सकते हैं। इस प्रकार के उपग्रहों द्वारा एकत्र सूचनाएँ सुदूर संवेदन, मौसम विज्ञान के साथ पृथ्वी के पर्यावरणीय अध्ययनों के लिए भी अत्यन्त उपयोगी हैं।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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