class 11 physics notes in hindi – chapter 6 – Work,Energy and Power, कार्य,ऊर्जा और शक्ति

  chapter 6 – कार्य, शक्ति और ऊर्जा  work power and energy – class 11 physics notes in hindi

 

  • कार्य (Work)-

किसी वस्तु पर बल (force) लगाने से यदि क्रिया-बिंदु में विस्थापन (displacement) उत्पन्न होता है। तब कार्य संपन्न हुआ माना जाता है। किसी वस्तु में गति उत्पन्न करने के बल लगाना पड़ता है, किए गए कार्य का परिमाण उतना ही अधिक होता है। वास्तव में कार्य किसी व्यक्ति या यंत्र द्वारा संपन्न नहीं होता, वरन कार्य बल द्वारा किया जाता है। भौतिक में कार्य की परिभाषा इस प्रकार दी जा सकती है

जब किसी वस्तु पर कोई बल इस प्रकार कार्य करता है कि उसमें गति जाए, अर्थात बल अपने क्रियाबिंदु को विस्थापित कर दे तो कहा जाता है कि बल किया गया।

 

  • कार्य की माप (Measurement of work)-

किए गए कार्य की माप लगाए गए बल बल की दिशा में वस्तु के विस्थापन के गुणनफल से की जाती है। यदि किसी वस्त पर लगाने से बल की दिशा में वस्तु का विस्थापन s हो, तो वस्तु पर आरोपित बल द्वारा कि गया कार्य

W = Fs

अर्थात,             कार्य = (बल) x (बल की दिशा में वस्तु का विस्थापन)

अब, यदि वस्तु पर बल F इस प्रकार लगता है कि वह बल की दिशा से Ө कोण पर झुकी रेखा पर s दूरी से विस्थापित होती है, तो बल द्वारा किया गया कार्य

W = Fs cosӨ

 अर्थात, कार्य = (बल) x (बल की दिशा में वस्तु का विस्थापन)

समीकरण (W=Fscos Ө) में  यदि

(i) Ө = 0°, तो किया गया कार्य

W = Fs cos 0° = Fs

(ii) 0 = 90°, तो किया गया कार्य

W = Fs cos 90° = F x 0 = 0

  • अर्थात, किसी बल द्वारा उसकी दिशा के लंबवत विस्थापन में कोई कार्य नहीं होता हा (iii) 0 =180°, तो किया गया कार्य,

W = Fs cos 180° = F(-s) = -Fs

 

महत्पूर्ण बिंदु –

(1) कार्य अदिश राशि (scalar quantity) होता है |

(2) कार्य धनात्मक अथवा ऋणात्मक हो सकता है।

(3) जब बल और विस्थापन एक ही दिशा में हों तो किया गया कार्य धनात्मक (positive) जाता है। परंतु, यदि विस्थापन बल के लगने की विपरीत दिशा में हो तो किया गया कार्य ऋणात्मक (negative) होता है।

(5) घर्षण बल द्वारा सम्पादित कार्य ऋणात्मक (negative) होता है।

अदिश गुणन (scalar product) के रूप में कार्य को निम्नलिखित समीकरण से व्यक्त किया

जाता है

W = \vec{F} . \vec{s}

 

  • कार्य के मात्रक (Units of work) –

कार्य का SI मात्रक जल (joule) है जिसका संकेताक्षर J है।1J वह कार्य है जब 1N का बल अपने क्रिया-बिंदु को अपनी दिशा में 1 m से विस्थापित कर देता है। अर्थात,

1 J = 1 N x1m

या

1J = 1 Nm

[cgs पद्धति में कार्य का मात्रक अर्ग (erg) होता है और 1J = 10^{7} erg.]

कार्य की विमाएँ (dimensions) M L T^{-2}  होती हैं।

  • शक्ति (Power) –

कार्य करने की दर को शक्ति (power) कहते हैं। (Rate of doing work is called power.)

दूसरे शब्दों में, एकांक समय में किए गए कार्य से शक्ति की माप होती है।

अतः,         शक्ति = \frac{ कार्य }{ समय }

या                  P = \frac{ W }{ t }

यदि किसी क्षण वस्तु पर क्रियाशील बल F तथा तात्कालिक वेग । हो, तो तात्कालिक शक्ति (instantaneous power)

P = \vec{F} . \frac d.\vec{s}

 

  • शक्ति के मात्रक (Units of power) –

शक्ति का SI मात्रक Js ^{-1} होता है। इसे वाट (watt, संकेत W) कहते हैं। यदि 1 s में 1J कार्य संपन्न होता है तो शक्ति 1 W होगी।

व्यवहार में शक्ति का मात्रक W छोटा पड़ जाता है। अतः इसे प्रायः किलोवाट (kilowatta kW) या मेगावाट (megawatt, MW) में मापा जाता है।

1 kW = 10v^{3}w w

1MW = 10v^{6}w w

शक्ति का एक अन्य मात्रक अश्व-शक्ति (horsepower, संकेत है।

1 hp = 746 W (लगभग)

शक्ति की विमाएँ (dimensions) M L T-3 होती हैं।

 

  • ऊर्जा (Energy): –

कार्य करने की क्षमता को ऊर्जा कहते हैं । कोई वस्तु कितना कार्य करती है उससे उसकी ऊर्जा की माप की जाती है । इसलिए . ऊर्जा का मात्रक भी कार्य का ही मात्रक (जूल) है ।

ऊर्जा अदिश राशि है । ऊर्जा के अनेकों रूप हैं—ऊष्मा ऊर्जा, विद्युत ऊर्जा, ध्वनि ऊर्जा, प्रकाश ऊर्जा, रसायन ऊर्जा, न्यूक्लीयर (Nuclear) ऊर्जा, यान्त्रिक ऊर्जा आदि ।

1 अर्ग (erg) = 10^{-7} J

1 इलेक्ट्रॉन वोल्ट (eV) = 1.6 x 10^{-19} JE

 

  • यान्त्रिक ऊर्जा दो प्रकार की होती हैं :-

(i)  गतिज ऊर्जा (Kinetic energy)

(ii) स्थितिज  ऊर्जा (Potential energy)

 

(i) गतिज ऊर्जा (गति के कारण ऊर्जा) : (Kinetic energy; Energy due to motion) :-

किसी वस्तु की वह ऊर्जा, जो उसकी गति के कारण होती है, गतिज ऊर्जा कहलाती है। इसे प्रायः E से प्रदर्शित किया जाता है। यदि m द्रव्यमान की वस्तु v वेग से जा रही हो, तो उसकी

गतिज ऊर्जा Ev = mve

गतिज ऊर्जा भी एक अदिश राशि (scalar quantity) है।

(ii) स्थितिज ऊर्जा (Potential energy)-

किसी निकाय (system) की वह ऊर्जा, जो इसके कणों की स्थिति (position) अथवा संरूपण (configuration) के कारण होती है, स्थितिज ऊर्जा कहलाती है। इसे प्रायः Ep से प्रदर्शित किया जाता है।

किसी वस्तु को अपनी वर्तमान स्थिति से एक प्रामाणिक स्थिति (जहाँ स्थितिज ऊर्जा शून्य मानी जाती है) तक जाने में बाह्य बल द्वारा जितना कार्य संपादित होता है उसी से उसकी स्थिातज ऊर्जा मापी जाती है। पृथ्वी-तल को सामान्यतः प्रामाणिक स्थिति माना जाता है। इसे शून्य स्तर  (zero level) भी कहते हैं।

यदि m द्रव्यमान की एक वस्तु को पृथ्वी-तल से h ऊँचाई तक किसी भी पथ से उठाया जाए तो इसके लिए गुरुत्व-बल के विरुद्ध किए गए कार्य से निकाय (system) में संचित-स्थितिज ऊजा की माप होती है। इसे गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा कहा जाता है। अतः,

स्थितिज ऊर्जा Ep = mgh

जहाँ, g गुरुत्वीय त्वरण है।

 

  • कार्य की गणना (Calculation of Work Done) –

यदि बल के कारण किसी वस्तु में विस्थापन हो, तो सम्पादित कार्य तथा समाकलन करने पर कुल सम्पादित कार्य

W=\int \vec{F}

 

(i) नियत बल (constant force) के कारण संपादित कार्य

यदि बल F परिमाण एवं दिशा में एकसमान हो तब कार्य

W=\int \vec{F} \cdot d \vec{r}=\vec{F} \cdot \int d \vec{r} \approx \vec{F} \cdot \vec{r}=F r \cos \theta

जहाँ वस्तु का कुल विस्थापन परिमाण एवं दिशा \vec{r}   में  है तथा \vec{F}    एवं \vec{r}    के बीच \theta कोण बनता है। उदाहरण के लिए, पृथ्वी के गुरुत्वीय क्षेत्र में यदि m द्रव्यमान की वस्तु ऊर्ध्वाधर तल में पथ APB तय करती हो  तो आरोपित बल \vec{F} (= m\vec{g}  )     द्वारा संपादित कार्य

W = \vec{F}.\vec{F}    = (m\vec{F}    ). \vec{F}  = mgAB cos \theta  = mgAO = mgh

यहाँ, h = AO = वस्तु का नीचे की ओर ऊर्ध्वाधरतः विस्थापन तथा \theta = OAB (बल एवं विस्थापन के बीच का कोण)।

यहाँ गुरुत्वीय बल द्वारा किया गया कार्य धनात्मक है, परंतु जब वस्तु को B से A की ओर BPA पथ से फेंका जाए तब संपादित कार्य गुरुत्व के विपरीत होता है, गुरुत्व द्वारा किया गया कार्य ऋणात्मक होगा। इसके अतिरिक्त कार्य का परिमाण केवल A तथा B बिंदुओं की स्थिति पर निर्भर करता है, A को B से मिलानेवाले सभी पथ के लिए समान परिमाण का कार्य mgh होगा।

 

(ii) परिवर्ती बल (variable force)  द्वारा एकविम में किया गया कार्य

एकविम में (in one dimension) यदि x-दिशा में परिवर्ती बल स्थिति x के फलन (function) F(x) के रूप में व्यक्त हो. तो कण में dx विस्थापन उत्पन्न करने पर संपादित कार्य

dW = Fdx . cos\theta = \vec{F}.\vec{dx}  = F.dx

 

(:: \vec{F} तथा \vec{dx}  की दिशाएँ समान हैं)

अतः, कुल कार्य W =\int {dW}   =  w=\int d W=\int_{i_{1}}^{x} F d x

 

चित्र

 

 

चित्र  में परिवर्ती बल द्वारा किया गया कार्य छायांकित क्षेत्र के बराबर होता है। स्पष्टतः कुल कार्य, बल-विस्थापन वक्र के अंतर्गत क्षेत्रफल (area under the force-displacement curve) के बराबर होता है।

 

(iii) स्प्रिंग बल (spring force) के अधीन संपादित कार्य – (कमानी बल)

किसी स्प्रिंग में प्रसार (extension) उत्पन्न करने के लिए बल लगाना पड़ता है तथा बल परिमाण (F) उत्पन्न उत्पन्न (x) का के समानुपाता होता है, अर्थात

F ∝ x

या

F = kx

नियतांक k को बल नियतांक (force constant) या स्प्रिंग नियतांक (spring constant) कहते हैं। k का SI का मात्रक N\m ^{-1} होता है। स्प्रिंग बल F एक परिवर्ती बल है (समी जिसका मान प्रसार अथवा संकुचन x पर निर्भर करता है। अब यदि स्प्रिंग में कुल प्रसार अथवा x संकुचन उत्पन्न किया जाए, तो कुल कार्य

W= \int_{0}^{x} F d x=\int_{0}^{x} k x d x=\frac{1}{2} k x^{2}

 

चित्र में स्प्रिंग बल के अधीन संपादित कार्य छायांकित क्षेत्र से दिखाया गया है जिसका क्षेत्रफल

\frac{1}{2} (kx){x} = \frac{1}{2} k x^{2}

यदि स्प्रिंग का प्रसार x1 , से बढ़ाकर x2, किया जाए तब संपादित कार्य

W= \int F \cdot d x=\int_{x_{1}}^{x_{2}} k x d x=\frac{1}{2} k\left(x_{2}^{2}-x_{1}^{2}\right)

 

(iv) परिवर्ती बल के कारण द्विविम में संपादित कार्य (Work done by a variable force in two dimensions)-

यदि किसी वक्र-पथ (curved path) पर गतिशील कण पर परिवर्ती बल लगता हो तब कण को किसी बिंदु a से b तक विस्थापित करने में संपादित कार्य –

W_{a b}=\int_{d}^{b} \vec{F} \cdot d \vec{r}

 

\vec{F}  तथा d\vec{x}  को x तथा y घटकों में व्यक्त करने पर,

\vec{F}=F_{x} \hat{i}+F_{y} \hat{j} \text { तथा } \overrightarrow{d r}=d x \hat{i}+d y \hat{j}

 

W_{a b}=\int_{a}^{b}\left(F_{x} \hat{i}+F_{y} \hat{j}\right) \cdot(d x \hat{i}+d y \hat{j})

 

= \int_{a}^{b}\left(F_{x} d x+F_{y} d y\right)

 

= \int_{a}^{b} F_{x} d x+\int_{a}^{b} F_{y} d y

 

यदि, F_{x} तथा F_{y}क्रमशः x तथा y के फलन (function) के रूप में दिए गए हों, तो उपर्युक्त समीकरण से समाकलन करने पर अभीष्ट कार्य की गणना हो जाती है।

 

  • कार्यऊर्जा प्रमेय (Work energy theorem) :-

माना कि m द्रव्यमान की वस्तु u वेग से गतिशील है । F बल इस वस्तु पर कार्य करता है जिससे इसका वेग v हो जाता है । बल द्वारा किया गया कार्य

=   \mathrm{W}=m \int_{u}^{v} v d v=\frac{1}{2} m\left(v^{2}-u^{2}\right)

= \frac{1}{2} m v^{2}-\frac{1}{2} m u^{2}

= अन्तिम ग• ऊर्जा – प्रा० ग० ऊर्जा

= गतिज ऊर्जा में परिवर्तन

अतः किसी वस्तु को विस्थापित करने में बल द्वारा किया गया कार्य वस्तु में गतिज ऊर्जा का परिवर्तन है । इसी को कार्य-ऊजो – प्रमेय कहते हैं । इस तरह जब कोई बल किसी वस्तु पर कार्य करता . है, तव वस्तु की गतिज ऊर्जा बढ़ती है । गतिज ऊर्जा में वृद्धि बल द्वारा किये गये कार्य के तुल्य होता है । इस कथन का विलोम Converse) भी सत्य है । अब प्रतिरोधी बल (Retarding force) से किसी वस्तु की गतिज ऊर्जा घटायी जाती है तब गतिज ऊर्जा की कमी प्रतिरोधी बल के विरुद्ध वस्तु द्वारा किये गये कार्य के तुल्य होता है । अतः गतिज ऊर्जा और कार्य एक-दूसरे के समतुल्य हैं और इसलिए दोनों का मात्रक (जूल) समान होता है ।

 

  • संरक्षी बल (Conservative Forces)-

वैसे बल को संरक्षी बल कहा जाता है जिस बल के द्वारा किसी पिण्ड पर किया गया कार्य गति के पुरे चक्र में शुन्य होता है |

उदाहरणार्थ,

(a) ऊर्ध्वाधरतः ऊपर की ओर फेंकी गई गेंद की चाल क्रमशः घटती जाती है, फलतः इसका रूपांतर स्थितिज ऊर्जा के रूप में होता है (यहाँ हम गतिज ऊर्जा को स्थितिज ऊर्जा के रूप में जमा करते हैं)। लेकिन, गेंद के लौटने के क्रम में वह स्थितिज ऊर्जा पुनः गतिज ऊर्जा के रूप में प्राप्त होती है। यदि वायु प्रतिरोध (air resistance) को नगण्य मान लिया जाए तब लौटने पर गेंद की चाल वही होती है जिस चाल से उसे प्रारंभ में फेंका गया था। इस प्रकार गुरुत्वीय क्षेत्र में ऊर्जा-संरक्षण नियम मान्य है।

(b) किसी चिकने (smooth) क्षैतिज तल पर दृढ़ आधार से जुड़े आदर्श स्प्रिंग S की ओर किसी ब्लॉक A को Vo चाल से गतिशील करने पर वह स्प्रिंग को संकुचित करता है [चित्र] और क्षणिक विराम (momentary rest) में आ जाता है। यहाँ ब्लॉक की गतिज ऊर्जा संकुचित स्प्रिंग में स्थितिज ऊर्जा के रूप में संचित होती है। परंतु, प्रकृति का यह मौलिक नियम है कि कोई निकाय हमेशा अपनी स्थितिज ऊर्जा को न्यूनतम बनाए रखता है। (A system always maintain its potential energy to a minimum value.) फलतः, स्प्रिंग पुनः अपना पूल अवस्था प्राप्त करने के क्रम में चित्र  ब्लॉक को पर्ववत प्रारंभिक गतिज ऊर्जा लौटा देता सर्षण रहित अवस्था में इस निकाय के लिए ऊर्जा-संरक्षण नियम मान्य रहता है।

इस प्रकार के सभी निकायों में जिनके लिए गतिज ऊर्जा एवं स्थितिज ऊर्जा के बीच परस्पर रूपांतर (mutual conversion) होता है, कल यांत्रिक ऊर्जा (KE + PE) संरक्षित (conserved) रहती है। ऐसे सभी निकायों में लगनेवाले बल (यहाँ गुरुत्वीय एवं स्प्रिंग बल) को संरक्षी वल (conservative force) कहा जाता है। आवेशों के बीच आरोपित वैद्युत बल संरक्षी होता है।

  • संरक्षी बलों के प्रमुख लक्षण (Essential Features of Conservative Forces)-

(a) संरक्षी बलों द्वारा किया गया कार्य हमेशा उत्क्रमणीय (reversible) होता है, अर्थात संचित ऊर्जा को बिना ह्रास के पुनः प्राप्त किया जाता है।

(b) संरक्षी बलों द्वारा संपादित कार्य केवल प्रारंभिक अवस्था  (i) और अंतिम अवस्था (f) पर

निर्भर करता है, i तथा f को मिलानेवाले पथ (path) पर बिल्कुल नहीं। चित्र में गुरुत्व के अधीन पथ 1 तथा पथ 2 में समान परिमाण के कार्य होंगे।

(c) एक पूर्ण चक्रीय प्रक्रम (cyclic process) में संरक्षी बल द्वारा नेट कार्य शून्य होता है।

इस प्रकार केवल संरक्षी बलों के अधीन कुल यांत्रिक ऊर्जा संरक्षित रहती है। संरक्षी बलों की श्रेणी में गुरुत्वीय तथा स्प्रिंग बलों के अतिरिक्त आवेशों के बीच लगनेवाला कूलंब या कूलॉम बल भी है।

केवल संरक्षी बलों के अधीन ही किसी निकाय की स्थितिज ऊर्जा परिभाषित होती है। (Potential energy function U can only be defined for conservative forces.)

 

  • असंरक्षी अथवा क्षयकारी बल (Nonconservative or Dissipative Forces)-

वैसे बल को असंरक्षी बल कहते हैं जिस बल द्वारा किसी पिण्ड पर किया कार्य गति के पूरे चक्र में शून्य नहीं होता है।

घर्षण बल असंरक्षी बल का उदाहरण है । अगर रूखड़े तल पर A बिन्दु से B बिन्दु तक किसी पिण्ड को खिसकाया जाता है । तो इसमें घर्षण बल द्वारा किया गया कार्य A और B बिन्दु के बीच की • दूरी पर निर्भर करता है । दूरी अधिक होने से कार्य अधिक और दूरी कम होने से कार्य कम करना पड़ता है। इसी तरह टेढ़े-मेढ़े रास्ते से होकर पिण्ड को खिसकाने से अधिक कार्य करना पड़ता है। घर्षण बल असंरक्षी बल है । इन उदाहरणों के आधार पर संग असंरक्षी बलों को नीचे जैसे भी परिभाषित किया गया है ।

वैसे बल को संरक्षी बल कहते है जिसके द्वारा किसी पिंड  गया कार्य पिंड को सिर्फ प्राम्भिक और अंतिम स्तिथि पर ही निर्भर करता है उसके गमन पथ पर निर्भर नहीं करता | इसी तरह वैसे बल को असंरक्षी बल कहते है जिसके द्वारा किसी पिंड पर किया गया कार्य पिंड के दोनों स्तिथि ( प्रारम्भिक और अंतिम ) तथा गमन पथ पर निर्भर करता है |

Note-

(a) असंरक्षी बलों (nonconservative forces) के अधीन एक पूर्ण चकर द्रष्टव्य कार्य शून्य नहीं होता है।

(b) ऐसे बलों के लिए स्थितिज ऊर्जा फलन (potential energy function) परिभाषित

हो सकता।

(c) ऐसे बलों के अधीन सामान्यतः गतिज ऊर्जा में उत्तरोत्तर ह्रास होता है जिसे स्थितिज ऊर्जा के रूप में प्राप्त नहीं किया जा सकता, अतः इन्हें क्षयकारी (dissipative forces) भी कहा जाता है।

(d) कछ ऐसे भी असंरक्षी बल होते हैं, जो यांत्रिक ऊर्जा में वृद्धि करते हैं और पटाखों के टुकड़े अत्यधिक गतिज ऊर्जा से इधर-उधर बिखर जाते हैं। समान अभिक्रियाओं के कारण उन्मुक्त बल असंरक्षी होते हैं; क्योंकि ये अभिक्रियाएँ उत्क्रमणीय (reversible) नहीं हैं।

 

  • स्थितिज ऊर्जा की अभिधारणा (Concept of Potential Energy) –

(a) किसी वस्तु की स्थितिज ऊर्जा का अर्थ है उसमें संचित ऊर्जा (stored energy) जिसके कारण वस्तु में कार्य करने की क्षमता (capacity) होती है।

उदाहरण – किसी खिंचे हुए (stretched) तीर-कमान की डोरी (string) में स्थितिज ऊर्जा संचित रहती है जो ढीला (relaxed) छोड़ देने पर तेजी से जाते हुए तीर में गतिज ऊर्जा (kinetic energy) के रूप में बदल जाती है। इसी प्रकार संकुचित स्प्रिंग (compressed spring) में भी स्थितिज ऊर्जा संचित रहती है।

(b) स्थितिज ऊर्जा का अस्तित्व (existence) केवल संरक्षी बलों (conservative forced) के अधीन होता है, असंरक्षी बलों (nonconservative forces) के लिए कदापि नहीं।

जैसे पृथ्वा का सतह से किसी वस्तु को ऊपर ले जाने के क्रम में गरुत्वीय बल द्वारा ऋणात्मक कार्य     (= – mgx) संपादित होता है जो वस्त में स्थितिज ऊर्जा में वृद्धि (= +mgx) के रूप में संचित रहता  है। चाहें हम इस संचित स्थितिज ऊर्जा को गतिज ऊर्जा (kinetic energy) में बदल सकता पनबिजली शक्ति-संयंत्रों (hydroelectric power plant) में भी संचित ऊजी पाना का ऊर्जा का उदाहरण है।

Note-

स्पष्टतः स्थितिज ऊर्जा की अभिधारणा केवल उन्हीं बलों की श्रेणी में लागू होता जहाँ बल के विरुद्ध किया गया कार्य, ऊर्जा के रूप में संचित (stored) हो जाता है। बाह्य कारक (agent) के हट जाने पर यह स्थितिज ऊर्जा स्वतः गतिज ऊर्जा के रूप में  बदल  जाती है|

असंरक्षित बलों (nonconservative forces) के अधीन स्थितिज (conconservative forces) के अधीन स्थितिज ऊर्जा हो ही नहीं सकता क्योंकि ऐसे बलों (जैसे घर्षण बल, हवा का प्रतिरोध आदि) द्वारा कार्य के कम में ऊर्जा ह्रास (energy loss) होता है, ऊर्जा का संचय कदापि नहीं।

 

  • ऊर्जासंरक्षण का सिद्धांत (Principle of Conservation of Energy)

ऊर्जा संरक्षण का सिद्धांत इस प्रकार है – विश्व में ऊर्जा का कुल परिमाण नियत रहता है। ऊर्जा न उत्पन्न की जा सकती है और न ही नष्ट हो सकती है; केवल उसका रूपांतर हो सकता है। यह भौतिकी का आधारभूत सिद्धात है |

 

(a) सरल भौतिक निकाय में ऊर्जासंरक्षण (Conservation of Energy in Simple Physical Systems) –

(a) गुरुत्व के अधीन मुक्त रूप से गिरती हुई वस्तु में Aऊर्जा-संरक्षण (Conservation of energy of a body falling freely under gravity)-

मान लिया कि m द्रव्यमान की एक वस्तु पृथ्वी तल से h ऊँचाई पर रुकी है। अतः, निकाय (system) में स्थिति के कारण संचित स्थितिज ऊर्जा  (potential energy) Ep = mgh.

B चूँकि, A पर वस्तु में कोई गति नहीं है, अतः उसकी गतिज ऊर्जा शून्य होगी, अर्थात E_{k} = 0.

इसलिए A पर वस्तु की कुल ऊर्जा = mgh, और यह पूर्णतः स्थितिज ऊर्जा के रूप में है। यदि विरामावस्था से नीचे की ओर गिरने के क्रम में A से x दूरी पर किसी बिंदु B पर वस्तु का वेग v हो, तो गति के समीकरण से,

v^{2}=u^{2}+2gx = 0 + 2gx

[:: u= 0]

:: वस्तु की गतिज ऊर्जा = \frac {1}{2}m\{v^{2} = \frac {1}{2}m(2gx) = mgx

तथा

निकाय की स्थितिज ऊर्जा = mg(h-x), चूँकि पृथ्वी तल से B की ऊँचाई = (h-x)

:. B पर निकाय की कुल ऊर्जा = mg(h-x)+ mgx = mgh.

अंततः, वस्तु के बिंदु C पर पहुँचने के मात्र पहले निकाय की स्थितिज ऊर्जा शून्य है और वस्तु की गतिज ऊर्जा = \frac {1}{2}m\{v^{2}  = \frac {1}{2}m(2gh) = mgh. ....\{v^{2}-\{0^{2}= 2gh]

 

अतः, C पर पहुँचने के मात्र पहले वस्तु की कुल ऊर्जा = mgh, जो वस्तु में पूर्णतः गतिज ऊर्जा के रूप में संचित रहती है।

अतः, वायु-घर्षण को नगण्य मान लेने पर गुरुत्वाधीन निर्बाध रूप से (freely) गिरती हई वस्तु की कुल यांत्रिक ऊर्जा, अर्थात E_{p} + E_{p}

गति के क्रम में प्रत्येक बिंदु पर नियत रहती है, ऊर्जा का केवल रूपांतर होता है।

जब वस्तु पृथ्वी से टकराती है तो वस्तु की कुल ऊर्जा (जो गतिज ऊर्जा के रूप में रहती है) का रूपांतर ऊष्मा, ध्वनि आदि के रूप में हो जाता है और ऊर्जा-संरक्षण का सिद्धांत मान्य रहता है।

 

(b) प्रक्षेप्य गति में ऊर्जासंरक्षण (Conservation of energy in projectile motion) –

मान लिया कि m द्रव्यमान की एक वस्तु प्रारंभिक वेग ॥ से ऊपर फेंकी जाती है जिसकी दिशा क्षैतिज तल AB के साथ 0 कोण बनाती है। अतः, A पर निकाय की कुल ऊर्जा = स्थितिज ऊर्जा + गतिज ऊर्जा = 0 +½m{u}^2 = ½ m{u}^2

मान लिया कि गतिपथ के किसी बिंदु  C पर उसका वेग v है, क्षैतिज AB के साथ इसकी दिशा a कोण बनाती है तथा AB से C की ऊधिर ऊँचाई है।

चूँकि , वस्तु  पर केवल गुरुत्वीय त्वरण g उर्ध्वारत निचे की ओर लगता है, अतः वेग का क्षैतिज घटक अपरिवर्तित रहता है , अर्ताथ

 

Vcos ∝ = V cos⊖                                                                                   ………….. (i)

अतः ऊर्ध्वाधर गति के लिए गति के समीकरण से ,

(V sin∝)^2 = (U sin⊖)^2 – 2gh            ……………….(2)

समीकरण (i) के वर्ग को समीकरण (ii) में जोड़ने पर ,

v^{2}(\cos∝^{2} + \sin∝^{2})=u^{2}(\cos⊖^{2} + \sin⊖^{2})-2gh

या                   v^{2} = u^{2} – 2gh                     ………………..(3)

C पर वस्तु की गतिज ऊर्जा = ½ m{v}^2 = ½ m({u}^2 – 2gh)

और निकाय की स्तिथीज़ ऊर्जा = ½ mgh

C पर निकाय की कुल ऊर्जा = ½ m({u}^2-2gh) + mgh = ½ m{u}^2

अतः वायु घर्षण नागयण मानने पर प्रक्षेप्य के गतिपथ के प्रत्येक बिंदु पर गतिज ऊर्जा एवं स्तिथीज़ ऊर्जा का योगफल नियत रहता है | अर्थात प्रक्षेप्य की गति में ऊर्जा संरक्षित रहती है |

 (c) नाभिक के गिर्द इलेक्ट्रॉन की कक्षीय गति में ऊर्जासंरक्षण (Conservation of eneroy for the orbital motion of an electron round the nucleus)—

प्रत्येक परमाणु में इसके इलेक्ट्रॉन नाभिक के गिर्द निश्चित कक्षाओं (orbits) में घूमते रहते हैं। वृत्तीय गति के लिए आवश्यक अभिकेंद्र बल इनके विपरीत आवेशों के बीच लगते हुए आकर्षण-बल से प्राप्त होता है। यदि इलेक्ट्रॉन का आवेश =(-e), इसका द्रव्यमान = m, कक्षा की त्रिज्या =r तथा कक्षीय वेग = y हो, तो इसकी गतिज ऊर्जा = ½ m{v}^2

और स्थितिज ऊर्जा = \frac{1}{4 \pi \epsilon_{0}} \frac{(Z e)(-e)}{r} = -\frac{1}{4 \pi \epsilon_{0}} \frac{Z e^{2}}{r}

जहाँ z = परमाणु क्रमांक (atomic number)।

अतः, इलेक्ट्रॉन की कुल ऊर्जा = \frac{1}{2} m v^{2}+\left(-\frac{1}{4 \pi \epsilon_{0}} \frac{Z e^{2}}{r}\right)

अब, अभिकेंद्र बल = \frac{1}{r} m v^{2} =  \frac{1}{4 \pi \epsilon_{0}} \frac{(Z e)(e)}{r}

mv^{2} = \frac{1}{4 \pi \epsilon_{0}} \frac{Z e^{2}}{r}

mv^{2}

का मान समीकरण (i) में रखने पर,

इलेक्ट्रॉन की कुल ऊर्जा = \frac{1}{8 \pi \epsilon_{0}} \frac{Z e^{2}}{r}-\frac{1}{4 \pi \epsilon_{0}} \frac{Z e^{2}}{r} = -\frac{1}{8 \pi \epsilon_{0}} \frac{Z e^{2}}{r}

चूँकि z, e, r तथा \epsilon_{0} के मान नियत हैं, अतः इलेक्ट्रॉन की कुल ऊर्जा नियत रहता  है |  यहाँ  कुल ऊर्जा का मान ऋणात्मक है , इसका अर्थ यह है की गतिशील कण , अर्थात इलेक्ट्रॉन  आकर्षण-क्षेत्र में गतिशील है और इसे क्षेत्र से बाहर निकालने के लिए उर्जा प्रदान करनी पड़ती है। इलेक्ट्रॉन की इस अवस्था को बद्ध-अवस्था (bound state) कहा जाता है। इन तथ्यों का पूर्ण अध्ययन आधुनिक भौतिकी में बोर (Bohr) के सिद्धांत में किया गया है।

 

  • ऊर्जा का रूपांतर (Transformation of Energy) – ऊर्जा के विभिन्न रूप ( ऊर्जा संरक्षण के नियम )

किसी पिंड में कार्य करने की जितनी क्षमता (capacity) होती है उसे पिंड की ऊर्जा कहते हैं। ऊर्जा युक्त पिंड द्वारा कार्य करने के क्रम में उसकी ऊर्जा का ह्रास होता है जो अन्य प्रकार की ऊर्जा में रूपांतरित हो जाता है। ऊर्जा रूपांतरण के प्रारंभ तथा अंत में कुल ऊर्जा हमेशा नियत रहती है जिसे ऊर्जा-संरक्षण का सिद्धांत कहते हैं।

गुरुत्व के अधीन निर्बाध रूप से गिरते हुए पिंड की गति में, सरल लोलक की गति में तथा किसी कमानी (spring) के एक सिरे से बंधे पिंड की गति में गतिज एवं स्थितिज ऊर्जाओं के बीच परस्पर रूपांतरण होता है तथा इन ऊर्जाओं का कुल योग हमेशा नियत रहता है। __यांत्रिक ऊर्जा, अर्थात गतिज एवं स्थितिज ऊर्जाओं का संरक्षण तब मान्य होता है जब पिंड की गति किसी संरक्षी बल (conservative force) के अधीन हो रही हो। पिंड पर लगे हुए बल को संरक्षी (conservative) तब कहा जाता है जब बल द्वारा किया गया कार्य केवल पिंड की प्रारंभिक और अंतिम स्थितियों पर निर्भर करता है।

यदि ऊर्जा का रूपांतर असंरक्षी बल (nonconservative force) के अधीन हो; यांत्रिक ऊर्जा संरक्षित नहीं रहती। उदाहरण के लिए, घर्षण-बल संरक्षी बल ही (rough) नत समतल पर सरकते हुए पिंड की गतिज ऊर्जा और स्थितिज ऊर्जा नहीं रहता, बल्कि गति के क्रम में लगातार घटता रहता है।

 

  • ऊर्जा के विभिन्न रूप –

(a) पृथ्वी की सतह से किसी वस्तु को उठाने के क्रम में पेशीय ऊर्जा (muscular enerous ) का रूपांतर स्थितिज ऊर्जा में होता है।

(b) किसी पत्थर को फेंकने के क्रम में पेशीय ऊर्जा का रूपांतर गतिज ऊर्जा में होता है।

(c) गुरुत्व के अधीन निर्बाध रूप से गिरते हुए पिंड में स्थितिज ऊर्जा का रूपांतर गतिज

ऊर्जा में होता है।

(d) दो पत्थरों के रगड़ने में या गाड़ी के घूमते हुए पहियों को ब्रेक लगाकर रोकने में गतिज

ऊर्जा का रूपांतर ऊष्मा में होता है।

(e) भाप इंजन में ऊष्मा का रूपांतर गतिज ऊर्जा में होता है।

(f) श्वेत-तप्त धातु के पिंड में ऊष्मा का रूपांतर प्रकाश में होता है।

(g) फोटोग्राफिक प्लेट पर प्रकाश की रासायनिक प्रतिक्रिया में प्रकाश का रूपांतर

रासायनिक ऊर्जा में होता है।

(h) ईंधन के ज्वलन में रासायनिक ऊर्जा का रूपांतर ऊष्मा में होता है। (i) विद्युत-अपघटन (electrolysis) में विद्युतीय ऊर्जा का रूपांतर रासायनिक ऊर्जा में

होता है।

(j) संचायक सेल में रासयनिक ऊर्जा का रूपांतर विद्युतीय ऊर्जा में होता है।

(k) बिजली के हीटर में विद्युतीय ऊर्जा का रूपांतर ऊष्मा ऊर्जा में होता है।

(l) बिजली के बल्ब में विद्युतीय ऊर्जा का रूपांतर प्रकाश एवं ऊष्मा में होता है।

(m) बिजली के पंखे में विद्युतीय ऊर्जा का रूपांतर यांत्रिक ऊर्जा में होता है।

(n) डायनेमो अथवा टरबाईन में यांत्रिक ऊर्जा का रूपांतर विद्युतीय ऊर्जा में होता है।

(o) टेलीफोन अथवा विद्युत-घंटी में विद्युतीय ऊर्जा का रूपांतर ध्वनि ऊर्जा में होता है।

 

  • द्रव्यमान एवं ऊर्जा तुल्यता (Mass and Energy Equivalence)-

आइंस्टाइन के अनुसार द्रव्यमान को ऊर्जा में और ऊर्जा को द्रव्यमान में परिवर्तित किया जा सकता है। यदि द्रव्यमान m पूर्ण रूप से ऊर्जा में परिवर्तित हो जाए तो उत्पन्न तुल्य ऊर्जा E के लिए निम्नलिखित सूत्र मान्य है

E = m{c}^2

जहाँ, c निर्वात में प्रकाश की चाल है।

इस सूत्र के अनुसार 1 g द्रव्यमान को ऊर्जा में परिवर्तित करने पर 9×1013 J ऊर्जा प्राप्त होगी।

नाभिकीय अभिक्रियाओं, जैसे-नाभिकीय विखंडन (nuclear fission) तथा नाभिकीय संलयन (nuclear fusion) में अभिक्रिया के बाद कुल द्रव्यमान अभिक्रिया के पूर्व कुल द्रव्यमान से कम हो जाता है। द्रव्यमान में उत्पन्न यह ह्रास विभिन्न प्रकार की ऊर्जाओं के रूप में विमुक्त होता है। नाभिकीय रिऐक्टरों में विद्युत ऊर्जा का उत्पादन नाभिकीय विखंडन से किया जाता है। सूर्य से उत्पन्न होनेवाली अपार ऊर्जा का स्रोत नाभिकीय संलयन (nuclear fusion) है जिसमें हलके नाभिक मिलकर अपेक्षाकृत भारी नाभिक बनाते हैं और द्रव्यमान का ह्रास ऊर्जा में रूपांतरित होता है।

 

  • संघट्ट (collisions)-

टक्कर या संघट्ट एक प्रक्रिया है जिसमें एक पिण्ड दूसरे पिण्ड से टकराते हैं और ऊर्जा एवं संवेग का विनिमय (Exchange) करते हैं ।

टक्कर का वर्गीकरण इस आधार पर किया जाता है कि टक्कर में गतिज ऊर्जा संरक्षित रहती है या नहीं ।

  • प्रत्यास्थ संघट्ट ( Elastic collisions)-

जिस टक्कर में गतिज ऊर्जा संरक्षित रहती है उस टक्कर को प्रत्यास्थ संघट्ट कहते हैं । परमाण्विक (Atomic), नाभिकीय (Nuclear) और मूल (Fundamental) कणों के बीच टक्कर लगभग प्रत्यास्थ होती है । हाथी दाँत या काँच की गेंदों के बीच भी टक्कर लगभग प्रत्यास्थ होती है ।

 

  • अप्रत्यास्थ संघट्ट (inElastic collisions)-

जिस टक्कर में गतिज ऊर्जा संरक्षित नहीं रहती है उस टक्कर को अप्रत्यास्थ संघट्ट कहते हैं । टक्कर के बाद आपस में जब पिण्ड सट जाते हैं, तो वैसी टक्कर पूर्णतः अप्रत्यास्थ कहलाती है । बन्दुक की गोली और उसके लक्ष्य (Target) के बीच टक्कर पूर्णतः अप्रत्यास्थ है जब गोली लक्ष्य में समाकर रह जाती है ।

 

  • एकविमीय संघट्ट ( one dimensional collisions )-

यदि दोनों पिंडो के आरम्भिक तथा अंतिम वेग एक ही सरल रेखा के अनुदिश कार्य करते है तो  ऐसे संघट्ट को एकविमीय संघट्ट अथवा सीधा संघट्ट कहते है |

Ө_{1} = Ө_{2} = 0

 

m_{l} v_{u}=\left(m_{1}+m_{2}\right) v_{f}

 

v_{f}=\frac{m_{1}}{m_{1}+m_{2}} v_{1 t}     …………………..(i)

 

संघट्ट में गतिज ऊर्जा की क्षति –

\Delta K=\frac{1}{2} m_{1} v_{1 i}^{2}-\frac{1}{2}\left(m_{1}+m_{2}\right) v_{f}^{2}

 

=\frac{1}{2} m_{1} v_{1 t}^{2}-\frac{1}{2} \frac{m_{1}^{2}}{m_{1}+m_{2}} v_{1 t}^{2}     ……..(i)से

 

=\frac{1}{2} m_{1} v_{1 i}^{2}\left[1-\frac{m_{1}}{m_{1}+m_{2}}\right]

 

=\frac{1}{2} \frac{m_{1} m_{2}}{m_{1}+m_{2}} v_{1 t}^{2}

 

जो की अपेक्षा अनुसार एक धनात्मक राशि है |

यहाँ हम प्रत्यास्थ संघट्ट के स्तिथि को देखेंगे |

उपरोक्त प्रयोग के साथ हम देखेंगे – यहाँ Ө_{1} = Ө_{2}= 0की लेने पर , रेखीय संवेग एवं गतिज ऊर्जा के सनरक्षण का समीकरण निम्न है |

m_{1} v_{1 t}=m_{1} v_{1 f}+m_{2} v_{2 f}                       ……………(ii)

 

m_{1} v_{1 t}^{2}=m_{1} v_{1 f}^{2}+m_{2} v_{2 f}^{2}           …………..(iii)

समीकरण (i) और  समीकरण (ii) से हम प्राप्त करते है

m_{1} v_{1 t}\left(v_{2 f}-v_{1 t}\right)=m_{1} v_{1 f}\left(v_{2 f}-v_{1 f}\right)

अथवा

v_{2 f}\left(v_{1 t}-v_{1 f}\right)=v_{1 t}^{2}-v_{1 f}^{2}

 

=\left(v_{1 t}-v_{1 f}\right)\left(v_{1 t}+v_{1 f}\right)

 

अतः v_{2 f}=v_{1 t}+v_{1 f}

इसे समीकरण (ii) में प्रतिस्थापित करने पर हम प्राप्त करते है

v_{1 f}=\frac{\left(m_{1}-m_{2}\right)}{m_{1}+m_{2}} v_{1 t}

 

तथा v_{2 f}=\frac{2 m_{1} v_{1 t}}{m_{1}+m_{2}}

v_{1f}=0,v_{2f}=v_{1f}

 

इस प्रकार अज्ञात राशियाँv_{1f}=0,v_{2f}=v_{1f} ज्ञात राशियों m_{1},m_{2}के पदों में प्राप्त हो गयी है

स्तिथि – 1
यदि दोनों द्रव्यमान सामान हो अर्थात तब –
प्रथम द्रव्यमान वीरामवस्था में आ जाता है और संघट्ट के पश्चात दूसरा द्रवमान , प्रथम द्रव्यमान का आरम्भिक वेग प्राप्त कर लेता है |

स्थिति – 2
यदि एक पिंड का द्रव्यमान दूसरे पिंड के द्रव्यमान से अधिक है अर्थात तब
भारी द्रव्यमान स्तिथिर रहता है जबकि हलके द्रव्यमान का वेग उत्क्रमित हो जाता है |

m_{2}>>m_{2} v_{1f} = -v_{1f} , U_{2f} = 0

 

  • द्विमीय संघट्ट ( two dimensional collisions)-

यदि आरम्भिक वेग तथा अंतिम वेग दोनों एक ही तल में हो तो संघट्ट द्विविमय कहलाता है |

चित्र –

 

मान लिया कि m1 तथा m2 द्रव्यमान की दो वस्तुएँ A तथा B हैं जिन्हें मिलानेवाली सरल रेखा अनुदिश  है। प्रारंभ में B को स्थिर मानते हैं तथा A को B की ओर :- दिशा में अचर वेग  गतिशील मानते हैं। अब टक्कर के समय संपर्की तलों के बीच लगनेवाला संपर्की बल (contact force) मूलतः अभिलंब प्रतिक्रिया (normal reaction) है, जो उनपर डाले गए उभयनिष्ठ अभिलंब (common normal) की दिशा में लगता है। यदि A का वेग इस उभयनिष्ठ अभिलंब की दिशा में हो तब टक्कर के बाद A तथा B उसी रेखा पर (सम्मुख टक्कर, head on Hellicon) गतिशील होते हैं, पर यदि A का वेग इस अभिलंब के साथ कुछ कोण बनाता हो, तो टक्कर के बाद A तथा B विभिन्न दिशाओं में गतिशील होंगे। स्पष्टतः, यह टक्कर द्विविम में (in wodimensions) होगी। मान लिया कि टक्कर के बाद A तथा B के वेग क्रमशः v1 तथा V2 हैं तथा इनकी दिशाएँ :-अक्ष से क्रमशः Ө1 तथा Ө2 कोण बनाती हैं।

अब X तथा Y दिशाओं में रैखिक संवेग-संरक्षण के सिद्धांत से,

m_{1}.u_{1} = m_{1}v_{1}\cosӨ_{1} + m_{2}v_{2}\cosӨ_{2}                  …………..(i)

तथा

0 = m_{1}v_{1}\sinӨ_{1} - m_{2}v_{2}\sinӨ_{2}                                                    ………….(ii)

पूर्णतः प्रत्यास्थ टक्कर के लिए ऊर्जा-संरक्षण के सिद्धांत से,

\frac{1}{2} m_{1} u_{1 }^{2}=\frac{1}{2} m_{1} v_{1 }^{2}+\frac{1}{2} m_{2} v_{2 }^{2}

पूर्णतः प्रत्यास्थ टक्कर के लिए ऊर्जा-संरक्षण के सिद्धांत से,

टक्कर के इस विचरण में चार अज्ञात राशियाँ v1,v2, Ө1, Ө2 तथा हैं जबकि प्राप्त तीन ही समीकरण (i), (ii) तथा (iii) हैं। फलतः इन चारों के मान ज्ञात नहीं किए जा सकते। इसके लिए एक अतिरिक्त समीकरण चाहिए। वस्तुतः, टक्कर के बाद की गति इस बात पर निर्भर करती है कि वस्तु A के प्रारंभिक u1 वेग , की दिशा संपर्की तलों पर उभयनिष्ट टक्कर से पहले टक्कर के बाद अभिलंब के साथ कितना कोण बनाती है।

संपर्की तलों पर अभिलंब क्रिया के लंबवत, अर्थात स्पर्शीय दिशा में बल अर्थात अभिलंब प्रतिक्रिया का स्पर्शीय घटक शून्य है, अतः टक्कर के क्रम में इस स्पर्शी दिशा में A तथा B के रैखिक संवेग को अलग-अलग संरक्षित मान सकते हैं तथा प्राप्त अतिरिक्त समीकरणों से परिणामी गति पूर्णतः ज्ञात हो जाती है।

  • प्रत्यवस्थान गुणांक (Coefficient of Restitution) –

दो पिंडों की टक्कर के बाद पृथक्करण के आपेक्षिक वेग (relative velocity of senant टक्कर से पहले उनके उपगमन के आपेक्षिक वेग (relative velocity of approach) के अनुपात को टक्कर का प्रत्यवस्थान गुणांक कहा जाता है। इसे प्रायः e से निरूपित किया जाता है। अतः

अर्थात पृथक्करण का आपेक्षिक वेगe x उपगमन का आपेक्षिक वेग (Relative velocity of separation =ex relative velocity of approach) –

e का न्यूनतम मान शून्य (पूर्णतः अप्रत्यास्थ टक्कर के लिए) तथा महत्तम मान 1 (प्रत्यास्थ टक्कर के लिए) होता है। स्पष्टतः, 0 ≤ e ≤1.

यदि कोई वस्तु किसी स्थिर समतल की लंबवत दिशा में टक्कर करता हो और टक्कर से पहले एवं बाद में वेग के परिमाण u एवं v हों, तो e की परिभाषा से,

V = e u

लेकिन, जब वह वस्तु \vec {u} वेग से उस समतल पर कुछ कोण 𝛂 बनाते हुए आपतित हो और B कोण बनाते हुए\vec {v} वेग से परावर्तित हो, तो उपगमन (approach) एवं पृथक्करण (separation) के वेग सतह पर अभिलंब ON के अनुरेख उनके घटक (components along the normal ON) से व्यक्त होते हैं। स्पष्टतः, उपगमन

वेग = ucos (90° – 𝛂 ) = usin 𝛂

पृथक्करण वेग  = vsin B

तथा परिभाषा से –

प्रत्यवस्थान गुणांक –

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