class 11 physics notes pdf in hindi – chapter 7 – कणो के निकाय तथा घूर्णन गति

class 11 physic notes pdf in hindi – chapter 7 – कणो के निकाय तथा घूर्णन गति     

CHAPTER – 7 – System of Particles and Rotational Motion                                                                    ( कणो के निकाय तथा घूर्णन गति )

 

  • कण

यदि किसी पिंड का आकार उसके द्वारा की गयी गति की तुलना में उपेक्षिणिय हो तो इस प्रकार के पिंड को उस गति के लिए कण माना जाता है |

  • ढृढ़ पिंड

एक आदर्श ढृढ़ पिंड वह है जिस पर वाह्य बल लगाने पर उसके कणो की स्तिथि में किसी प्रकार का कोई परिवर्तन न हो |

  • ढृढ़ पिंड की गतियाँ

ढृढ़ पिंड की दो तरह की गतियां होती है |

(1) स्थानातरित गति (Translatory motion) – जब किसी दृढ पिंड के विभिन्न कण सामान समय अंतरालों में सामान दुरी तय करे अथवा सामान दिशा में विस्थापित हो तो इस प्रकार की गति को स्थान्तरित गति कहते है |

(2) घूर्णन गति  ( Rotatory motion )-  जब कोई दृढ पिंड किसी स्थिर अक्ष के परितः गति करता है तो उसकी इस गति को घूर्णन गति कहते है |

 

  • घूर्णन अक्ष

घूर्णन गति करता हुआ कोई पिंड जिस अक्ष के परितः गति करता है उसे घूर्णन करते है |  नोट –  घूर्णन गति करते हुए पिंड के सभी कणों के रेखीय वेग (v ) अलग – अलग होते है जबकि सबका कोणीय वेग (w ) सामान  होते है |

 

  • द्रव्यमान केंद्रएक विशिष्ट बिन्दु

किसी पिंड अथवा कणो के निकाय का वह बिंदु जिस पर पिंड अथवा निकाय का सम्पूर्ण द्रव्यमान केंद्रित माना जा सकता है द्रव्यमान केंद्र कहलाता है | किसी पिंड का द्रव्यमान केंद्र वह बिंदु होता है जिसके परितः सभी कणों के द्रव्यमान आघुर्णो का सदिश योग शुन्य होता है |

m_1 \vec{r}_1 + m_2 \vec{r}_2 + m_3 \vec{r}_3 +...........+ m_n \vec{n}_1 = 0

\sum_{i = 1}{n} m_i\vec{r}_i = 0

 

  • दो कणों के निकाय का द्रव्यमान केन्द्र

(Centre of mass for a two-particle system):

मान लिया कि m_{1} तथा m_{2} द्रव्यमान के दो कण एक दूसरे से d दूरी पर स्थित है । इस निकाय के द्रव्यमान केन्द्र का स्थान ज्ञात करने के लिए m_{1} के स्थान को मूल-बिन्दु (origin) तथा इन्हें मिलानेवाली सरल रेखा को X-अक्ष मानते हैं । इस प्रकार m_{1} तथा m_{2} के xनियामक क्रमशः 0 तथा d होंगे तथा दोनों के Y तथा Z नियामक (0,0) होंगे । द्रव्यमान केंद्र की परिभाषा के अनुसार निकाय का x नियामक,

X_{cm} = \frac {1}{M} ∑m_{i}x_{i}

 

X_{cm} = \frac {1}{{m}_{1}} +m_{2} (m_{1}  x  0 + m_{2}  x  d) = (\frac {m_{2}d}{m_{1}+m_{2}})

इसी प्रकार –

Y_cm = \frac{1}{m_{1}+m_{2}} (m_{1}  x  0 + m_{2}  x  0) = 0

तथा   Z_{cm} = \frac {1}{m_{1}+m_{2}} (m_{1} x 0 + m_{2} x 0) = 0

अतः द्रव्यमान केन्द्र C की स्थिति ( (\frac {m_{2}d}{m_{1}+m_{2}}) ) होती है, अर्थात् द्रव्यमान केन्द्र दोनों कणों को मिलानेवाली रेखा पर स्थित होती है । यदि इस केन्द्र C की दूरी m_1 तथा m_2 से क्रमश: d_1 तथा d_2 हो तब, d_1 = \frac{m_{2}d}{m_{1}+m_{2}}  तथा d_2 = \frac{m_{1}d}{m_{1}+m_{2}}

इस प्रकार, \frac{d_{1}}{m_{1}}      या,     m_{1} d_{1} = m_{2} d_{2}

अतः दो कणों के निकाय का द्रव्यमान केन्द्र उन्हें मिलानेवाली रेखा को अंतरतः (internally) द्रव्यमानों का व्युत्क्रम अनुपात (inverse ratio) में विभाजित करता है ।

 

  • N-कण के निकाय का द्रव्यमान केन्द्र (Centre of mass of a system of N-particles):

एक ऐसे निकाय (system) पर विचार करें जिसमें N- कण हैं । इन कणों का द्रव्यमान m_{1} , m_{2} , m_{3} , ……… m_{n}  है । यह भी माना कि इन कणों की स्थिति सदिश (Position vector) क्रमशः \vec{r_1}, \vec{r_2} , \vec{r_3} ,……… \vec{r_n}   है । a, b, c, …….. द्वारा 1 से N कणों को निरूपित किया जाता है | a कण पर बाहरी बल (F_a) बाहरी कार्य करता है । इस कण पर एक आन्तिरिक बल (F_{a})_{b} , भी कार्य करता है । यहाँ b is not equal to a.

अब, न्यूटन के गति के दूसरे नियम को प्रत्येक कण के लिए लागू करके समीकरण प्राप्त करें । न्यूटन के गति के तीसरे नियम से कणों पर आन्तरिक बलों के प्रभाव को देखा जाता है । सामान्य समीकरण (General equations) नीचे जैसे प्राप्त किया जाता है ।

  कण द्वारा अनुभव कुल बल (total force experienced by path paticle)

न्यूटन के गति के तीसरे नियम को लागू करने और N-सदिश समीकरणों को जोड़ने पर,

पूरे निकाय के द्रव्यमान r केन्द्र की सदिश स्थिति (Position vector)

जहाँ – m = m_{1} + m_{2} + ……….. + m_{n} = निकाय का कुल द्रव्यमान सामान्यतः (In general)

यहाँ \vec {r} निकाय के कणों के स्थिति सदिश (Position vector) – का औसत है । गति के नियम के अनुसार \vec {r} गति करता है ।

Note –

(i) ऊपरी व्याख्या में बिन्दु द्रव्यमान (Point mass) पर न्यूटन के गति के नियमों को लागू करके हम अधिक द्रव्यमान (Large mass) के लिए न्यूटन का नियम प्राप्त करते है|

(ii) द्रव्यमान केन्द्र एक ऐसा बिन्दु है जहाँ कुल बाहरी बल कार्य करता है |

  • द्रव्यमान केन्द्र की गति  (Motion of the centre of mass):

यदि किसी निर्देश तन्त्र (Reference frame) में संकाय के द्रव्यमान केन्द्र की स्थिति सदिश समय के साथ बदले तो द्रव्यमान केन्द्र गति में कहा जाता है ।

माना कोई पिंड n कणो से मिलकर बना है जिनके द्रव्यमान m_{1} , m_{2} , m_{3},….m_{n} तथा इनके स्तिथि सदिश क्रमशः \vec{{r}_1}, \vec{{r}_{2}} ……… \vec{{r}_{n}}, अतः पिंड के द्रव्यमान केंद्र का स्तिथि सदिश –

\vec {r_{cm}} = m_{1}\vec{r_{1}} + m_{2}\vec{r_{2}} +……..+ m_{n}\vec{r_{n}}(m_{1}+m_{2}+m_{3} +……… m_{n} )

m_{1} + m_{2} + …….+ m_{n} = M  (निकाय का द्रव्यमान)

m \vec {r_{cm}} = m_{1}\vec{r_{1}} + m_{2}\vec{r_{2}} +…..+ m_{n} \vec{r_{n}}

दोनों पक्षों में \frac {d}{dt} से गुना करने पर

\frac {d}{dt}( m\vec {r_{cm}} ) = \frac {d}{dt} (m_{1}\vec{r_{1}} ) + \frac {d}{dt}(m_{2}\vec{r_{2}} ) +……….. + \frac {d}{dt}m_{n}\vec{r_{n}}

\frac {d}{dt}( m\vec {r_{cm}} ) = m_{1} \frac {d}{dt} (m_{1}) + m_{2} \frac {d}{dt} (m_{2}) + …………. + m_{n} \frac {d}{dt} (m_{n})

\frac {d \vec{r}}{dt} = \vec {v}

m.\vec {v}_cm = m_{1}\vec{v}_{1} + m_{2}\vec{v}_{2} + …… m_{n}\vec{v}_{n}   …..(1)

जहाँ क्रमशः \vec {v}_{1} , \vec{v}_{2} , \vec{v}_{n} तथा m_{1}, [latex]m_{2} , m_{3} कणो का वेग    है | समी के दोनों पक्षों में \frac {d}{dt} से गुना करने पर –

m \frac {d}{dt} \vec{v}_{cm} = m_{1} \frac {d \vec{v}_{1}}{dt} + m_{2}\frac {d \vec{v}_{2}}{dt} +........... m_{n}\frac {d \vec{r}_{v}}{dt}

\frac {d \vec{v}}{dt} = \vec {a}

m\vec{a}_cm = m_{1}\vec{a}_{1} + m_{2}\vec{a}_{2} +.....+ m_{n}\vec{a}_{n}

\vec {f} = mv\vec{a}

m\vec{a}_cm = \vec{f}_{1} + \vec{f}_{2} +...... \vec{f}_{n}

m\vec{a}_{cm} = \vec {f}_ {बाह्य}    ........................(2)

समी (2) से स्पस्ट है की बाह्य बल इस प्रकार व्यवहार करेगा जैसे की सम्पूर्ण बल पिंड पर ही आरोपित हो रहा है तथा पिंड के द्रव्यमान केंद्र की गति सम्पूर्ण केंद्र की गति को प्रदर्शित करेगी |

  • कणो के निकाय का रेखीय संवेग – (l.m of system of particle) –

समी (1) से  –

m.\vec {v}_cm = m_{1}\vec{v}_{1} + m_{2}\vec{v}_{2} + ...... m_{n}\vec{v}_{n}   .....(3)

यदि सम्पूर्ण पिंड का रेखीय संवेग P हो तो –

m_{1}\vec{v}_{1} + m_{2}\vec{v}_{2}   + ......... + m_{n}\vec{v}_{n} ......... (4)

समी (3) एवं (4) से –

\vec {P} = m.\vec {V}_{cm}      .............(5)

दोनों पक्षों को अवकलन करने पर – (t के सापेक्ष ) –

\frac {d \vec{p}}{dt} = \frac {d}{dt} (m\vec{v}_{cm} )

\frac {d \vec{p}}{dt} = m. \frac {d}{dt} \vec{v}_{cm}

\frac {dv}{dt} = a

\frac {d \vec{p}}{dt} = m.\vec{a}_{cm}    ...........(6)

m.\vec{a}_{cm}    = \vec {f} _ {बाह्य} 

\frac {d \vec{p}}{dt} \vec {f} _ {बाह्य}

\vec {f} _ {बाह्य}    = 0

\frac {d \vec{p}}{dt} = 0 = \frac {d}{dt} (m\vec{v}_{cm}) = 0

m \frac {d}{dt} (\vec{v}_{cm}) = 0

M  ≠ 0

\frac {d}{dt} (\vec{v}_{cm} = 0

V_{cm} =  नियत

वेग में परिवर्तन  = शुन्य

अतः बाह्य बल की अनुपस्थिति में पिंड किसी प्रकार की गति नहीं करेगा |

विस्थापन :- द्रव्यमान-केन्द्र के स्थिति सदिश में परिवर्तन को द्रव्यमान केन्द्र का विस्थापन कहते हैं ।

विस्थापन,

वेग :-  द्रव्यमान केन्द्र के स्थिति सदिश में परिवर्तन की दर को द्रव्यमान केन्द्र का वेग कहते हैं ।

त्वरण : द्रव्यमान केन्द्र के वेग में परिवर्तन की समय-दर को द्रव्यमान-केन्द्र का त्वरण कहते हैं । यदि कणों के त्वरण a तथा द्रव्यमान-केन्द्र का त्वरण a... हो तो सूत्र

को समय के सापेक्ष अवकलित करने पर,

 

  • अनेक कणों के संकाय का संवेग एवं द्रव्यमान –

किसी संकाय में स्थित कणों के संवेगों का सदिश योग उस संकाय का संवेग कहलाता है।

यदि m_1  द्रव्यमान का कण \vec{v}_1 वेग से m_1 द्रव्यमान का कण \vec{v}_2 वेग से चले तो संकाय का संवेग या रेखीय संवेग  \vec{p} होता है।

या

यदि संकाय के द्रव्यमान-केन्द्र का वेग  \vec{v}_cm  हो तो

 

चित्र –

या

जहाँ M = संकाय का कुल द्रव्यमान है।

या,

अर्थात् संकाय का कुल संवेग संकाय के कुल द्रव्यमान एवं द्रव्यमान-केन्द्र के वेग के गुणनफल के बराबर होता है चाहे उसके कणों की गति कैसी भी क्यों न हो |

  • ढृढ़ पिंड के द्रव्यमान-केन्द्र की गति

(Motion of the centre of mass of a rigid body):-

मान लिया कि कोई ढृढ़ पिंड (rigid body) m_1, m_2, ... द्रव्यमान के अनेक कणों से मिलकर बना है । दिए गए नियामक अक्ष के सापेक्ष इन कणों की स्थिति सदिश (position vector) मान लिया

क्रमशः \vec {r}_1, \vec {r}_2... है । द्रव्यमान-केन्द्र की परिभाषा से इनके नियामक

तथा

 

यदि द्रव्यमान-केंद्र का स्थिति सदिश \vec {R} हो तो

समीकरण (1) को समय t के सापेक्ष अवकलन करने पर,

जहाँ \vec {v}_{1} वें कण का वेग तथा V_{cm}  द्रव्यमान-केन्द्र का वेग है समीकरण (ii) का पुनः समय के सापेक्ष अवकलन करने पर,

      ..........(ii)

जहाँ \vec {a}_{1}  प्रथम कण का त्वरण और \vec {a}_{cm}  = द्रव्यमान केन्द्र का त्वरण

अब न्यूटन के दूसरे नियम से,

प्रथम कण पर बल \vec {f}_{1}  = m_{1} \vec {a}_{1}, इसी प्रकार अन्य कणों के

लिए \vec {f}_{2} = m_{2} \vec {a}_{2}, \vec {f}_{3} = m_{3} \vec {a}_{3}  आदि । इस प्रकार समीकरण (ii) से,

       ............... (iii)

समीकरण (iii) के अनुसार किसी दृढ़ पिंड़ पर लगनेवाले अनेक बलों का सदिश योगफल उसके कुल द्रव्यमान तथा द्रव्यमान केन्द्र के त्वरण के गुणनफल के बराबर होता है । अब कुल बलों के सदिश योगफल के क्रम में आंतरिक बल (internal forces) भी आते हैं, जो कणों के बीच परस्पर लगते हैं । न्यूटन के तीसरे नियम के अनुसार ये

आंतरिक बल क्रिया-प्रतिक्रिया युग्म (action- reaction pair) के रूप में वर्तमान रहते हैं तथा इनके बराबर और विपरीत होने के कारण इनका सदिश योगफल शून्य होता है । फलतः समीकरण (ii) में   \vec {f}_{1}, \vec {f}_{2}  , + ....... \vec {f}_{n}, = कुल बाह्य बल (total external force) = \vec {F}_{ext}  जो उस दृढ़ पिंड पर लगता है । इस प्रकार \vec {Ma}_{cm} = \vec {F}_{ext}

अर्थात् कुल बाह्य बल = दृढ़ पिंड का कुल द्रव्यमान x द्रव्यमान केन्द्र का त्वरण ।

 

  • दो सदिशों का सदिश गुणनफल (Vector Product of Two Vectors) –

दो सदिशों का सदिश गुणनफल (vector product) एक सदिश होता है जिसका मान उन सदिशों के मापांक (moduli) तथा उनके A x B बीच के कोण की ज्या (sine) के गुणनफल के बराबर होता है और दिशा (direction) दक्षिण-हस्त नियम के अनुसार दोनों सदिशों से गुजरनेवाले समतल के लंबवत होती है।

दो सदिश \vec {A} और \vec {B} के सदिश गुणनफल को संकेत \vec {A} * \vec {B} से प्रदर्शित किया जाता है तथा इसे क्रॉस गुणनफल (cross product) या बाह्य गुणनफल (outer product) भी कहा जाता है। यदि \vec {A} और \vec {B} के बीच का कोण (included angle) Ө हो  जहाँ 0 ≤ Ө ≤ T, तो उपर्युक्त परिभाषा से,

\vec {A} x \vec {B}  = AB sinӨ \hat{n}         ..... (1)

जहाँ  A और B सदिशों के मापांक हैं तथा \vec {A} और \vec {B} से संबद्ध तल के लंबवत दिशा में एकांक सदिश (unit vector) \hat{n} है।

चित्र सदिश \vec {A}  x \vec {B} की दिशा दक्षिणावर्ती पेंच नियम (right hand screw rule) या दक्षिण-हस्त नियम (right hand rule) द्वारा निर्धारित होती है, जैसा कि चित्र में दिखाया गया है।

चित्र से स्पष्ट है कि \vec {B} x \vec {A}   की दिशा नीचे की ओर, अर्थात \vec {A} x \vec {B} की दिशा के विपरीत होगी, अर्थात

\vec {A} x \vec {B} = - \vec {B} x \vec {A}

अर्थात सदिश गुणनफल, प्रतिक्रम-विनिमेय (anti-commutative) है।

 

NOTE - सदिश के बीच उस कोण (Ө) को लिया जाता है जब उनके प्रारंभिक बिंदु संपाती हों, तथा 0 ≤ Ө ≤ π .

 

  • सदिश गुणनफल के गुण (Some Properties of Vector Product) -

(a) यदि \vec {A} * \vec {B} = \vec {0} तो \vec {A} और \vec {B}  परस्पर समांतर होते हैं। दो सदिशों के समांतर (parallel) होने की यही आवश्यक शर्त है।

(b) दो सदिशों के सदिश गुणनफल का परिमाण हमेशा धनात्मक होता है जबकि अदिश गुणनफल ऋणात्मक भी होता है।

(c) सदिश गुणनफल प्रतिक्रम-विनिमेय (anti-commutative) होता है, अर्थात

\vec {A} x \vec {B} = - \vec {B} x \vec {A}   .

(d) सदिश गुणनफल बंटन नियम (distributive law) का पालन करता है, अर्थात

\vec {A} x (\vec {B} + \vec {C} ) = \vec {A}  x \vec {B} + [latex]\vec {A} x \vec {C}

(e) किसी सदिश का उसी सदिश से सदिश गुणनफल शून्य होता है. अर्थात                                                                                     \vec {A} x \vec {A} = \vec {0}

(f) परस्पर लंबवत एकांक सदिश \hat {i} , \hat {j} , \hat {k} के सदिश गुणनफल -        x, y, z अक्षो के अनुदिश एकांक सदिश \hat {i} , \hat {j} , \hat {k} हैं।                            अतः, l \hat {i} x \hat {i} l  =I \hat {j} x \hat {j} l = | \hat {k} x \hat {k} | = 1.1. sin 0° = 0

\hat {i} x \hat {j} = - \hat {j} x \hat {i}  = \hat {k}

\hat {j} x \hat {k}   = - \hat {k} x \hat {j} = \hat {i}

\hat {k} x \hat {i}  = - \hat {i} x \hat {k}   = \hat {j}

 

  • कोण (Angle) -

यदि R त्रिज्या वाले वृत्त के चाप (arc) की लंबाई s हो, तो उस वृत्त के केंद्र पर चाप द्वारा  (subtended) कोण Ө निम्नलिखित व्यंजक से परिभाषित होता है।

Ө = \frac {s}{R}

यदि s = R, तो Ө =1 रेडियन।

अतः, एक रेडियन (1 rad) वह कोण है जो किसी वृत्त के चाप (arc) द्वारा वृत्त के केंद्र पर तब अंतरित (subtend) होता है जब चाप की लंबाई वृत्त की त्रिज्या के बराबर होती है।

 

  • कोणीय वेग (Angular Velocity) –

यदि कोई ढृढ़ पिंड (rigid body) कागज के तल के लंबवत तथा बिंदु 0 से होकर गुजरते हुए अक्ष के परितः घूम रहा हो, तो इसके (ढृढ़ पिंड के) किसी बिंदु P की दूरी 0 से तो हमेशा स्थिर रहेगी, परंतु किसी निर्देश रेखा (reference line) Ox के सापेक्ष इसकी स्थिति निरंतर बदलती रहेगी। मान लिया कि OP रेखा समय पर Ox से , कोण तथा समय  पर Ox से 0, कोण बनाती है (चित्र )।

तब दृढ़ पिंड का औसत (माध्य) कोणीय वेग (average angular velocity) -

यदि Δt ⟶ 0 , तो औसत कोणीय वेग, तात्क्षणिक कोणीय वेग (instantaneous angular velocity) के बराबर होगा। अत:,

.................  (1)

कोणीय वेग एक छद्म सदिश राशि (pseudo vector quantity) है जिसका दिशा परिभ्रमण-तल के लंबवत होती है।

कोणीय वेग का SI मात्रक rad s^{-1} होता है और इसकी विमा (dimension)  होती है।

चूँकि एक पूरे चक्कर में कोई वस्तु 2 π रेडियन कोण से घूम जाती है तथा एक पूरा चक्कर लगाने में लगा समय T, वस्तु का परिभ्रमण-काल (period of revolution) कहलाता है; इसलिए वस्तु का कोणीय वेग

 

  • कोणीय त्वरण (Angular Acceleration) -

घूमती हुई किसी वस्तु के कोणीय वेग के परिवर्तन की दर को कोणीय त्वरण (angular acceleration) कहते हैं।

मान लिया कि किसी समय t_{1} पर किसी वस्तु का कोणीय वेग w_{1}[/latex] है तथा बाद के किसी अन्य समय t_{2} पर कोणीय वेग बढ़कर w_{2} हो जाता है तब वस्तु का औसत (माध्य) कोणीय त्वरण (average angular acceleration)

यदि Δt ⟶ 0, तो औसत कोणीय त्वरण, तात्क्षणिक कोणीय त्वरण (instantaneous angular acceleration) के बराबर होगा। अतः,

कोणीय त्वरण एक छद्म सदिश राशि (pseudo vector quantity) है। कोणीय त्वरण का SI मात्रक rads-2 होता है और इसकी विमा (dimension) T_{-2}  होती है।

 

  • रैखिक वेग तथा कोणीय वेग में संबंध (Relation between Linear Velocity and Angular Velocity) -

कोण के समीकरण से - Ө = \frac {s}{R}

Ө = \frac {s}{R} = s = R Ө

उपयुक्त समीकरण को t के सापेक्ष अवकलज करने पर ,

           .........................   (1)

परंतु परिभाषा से,  [ जहाँ, v, रैखिक वेग (linear velocity) है। ]

तथा       [ जहाँ, ω कोणीय वेग (angular velocity) है। ]

समीकरण (1) से, v = ωR        .......................  (2)

चूँकि \vec {v} , \vec {R} , तथा \vec {ω} सदिश राशियाँ हैं \vec {ω} और [latex]\vec {R} का सदिश गुणनफल \vec {v} के बराबर  होता है  | इसलिए समीकरण (2) को सदिश रूप में लिखने पर

 

  • रैखिक त्वरण तथा कोणीय त्वरण में संबंध (Relation between Acceleration and Angular Acceleration)

समीकरण v = ωR  का t के सापेक्ष अवकलन करने पर,

\frac {dv}{dt} = R \frac {dω}{dt}

परिभाषा से,

\frac {dω}{dt} = α  (जहाँ a कोणीय त्वरण (angular acceleration) है।

तथा \frac {dv}{dt} = a_{T}  [जहाँ a_{T} रैखिक त्वरण का स्पर्शरखीय घटक (tangential component) है।

चूँकि त्वरण का स्परिखीय घटक ही वेग के परिमाण में परिवर्तन लाता है , अतः

a_{T} = R α

  • जड़त्व-आघूर्ण (Moment of Inertia)

वस्तु का वह गुण जो उसकी घूर्णन गति की अवस्था में परिवर्तन का विरोध करता है. घूर्णन अक्ष के सापेक्ष वस्तु का जड़त्व-आघूर्ण (moment of inertia) कहा जाता है।

जड़त्व-आघूर्ण का SI मात्रक kg m^{2} होता है तथा इसकी विमाएँ (dimensions) ML^{2} होती है।

 

किसी कण का जड़त्व-आघूर्ण (Moment of Inertia of a Particle)

मान लिया कि AB एक स्थिर अक्ष है जिसके परितः m A . द्रव्यमान का एक कण घूर्णन गति (rotational motion) कर रहा है। यदि इस कण की अक्ष AB से लांबिक दूरी। हो, तो . कण का जड़त्व-आघूर्ण I = mr^{2} .

अर्थात, किसी कण का किसी अक्ष के सापेक्ष जड़त्व-आघूर्ण उस कण के द्रव्यमान तथा कण की घूर्णन-अक्ष से लांबिक दूरी के वर्ग के गुणनफल के बराबर होता है।

जड़त्व-आघूर्ण को हमेशा किसी घूर्णन-अक्ष के परितः व्यक्त किया जाता है।

 

  • बल - आघूर्ण या टॉर्क (Torque)-

यदि किसी वस्तु पर, जो किसी दिए गए अक्ष के परितः घूम सकती है, कोई बाह्य वल लगाया जाए तो वह वल उस वस्तु में घूर्णन गति (rotational motion) उत्पन्न करेगा। इस बल के आघूर्ण को वल-आघूर्ण या टॉर्क (torque) कहते हैं।

बल-आघूर्ण = जड़त्व-आघूर्ण x कोणीय त्वरण

बल-आघूर्ण (टॉर्क) एक सदिश राशि है जिसका SI मात्रक Nm होता है और इसको विमाएँ (dimensions) M L^{2} T^{-2} होती हैं। सदिश संकेत में, \vec {て} = \vec {r} x \vec {F} जहाँ \vec {F}   = कण पर आरोपित बल तथा \vec {r}   = कण का घूर्णन अक्ष के किसी बिंदु के सापेक्ष स्थिति-सदिश। स्पष्टतः टॉर्क \vec {て} को दिशा \vec {r}   तथा \vec { F}   से संबद्ध तल के लंबवत होगी।

 

  • बल-आघूर्ण तथा कोणीय संवेग में संबंध (Relation between Torque and Angular Momentum)

मान लिया कि कोई वस्तु किसी दिए हुए अक्ष के परितः कोणीय वेग ω से घूम रही है तथा इसका के सापेक्ष वस्तु का जड़त्व-आघूर्ण I तथा कोणीय संवेग (angular momentum) L हो

मान लिया कि वस्तु पर एक बल-आघूर्ण (torque) आरोपित किया जाता है जिससे इसमें कोणीय त्वरण (angular acceleration) α उत्पन्न हो जाता है, तो

て = Iα           ..............(1)

कोणीय संवेग से समीकरण –

L = I ω   या  \frac {dL}{dt} = I \frac {dω} {dt}

या \frac {dL} {dt} = Iα            ................ (2)

जहाँ   \frac {dL} {dt} = α कोणीय त्वरण

इस प्रकार समीकरण (1) तथा समीकरण (2)

て = \frac {dL} {dt}

अर्ताथ , किसी वस्तु पर आरोपित बल - आघूर्ण उसके कोणीय संवेग में परिवर्तन की दर के बराबर होता है|

 

  • ढृढ़ वस्तु की घूर्णन गति (Rotatory Motion of a Rigid Body) -

यदि किसी वस्तु या पिंड पर बाह्य बल लगाने से उसके कणों में एक-दूसरे के सापेक्ष कोई विस्थापन न हो, तो ऐसी वस्तु को ढृढ़ वस्तु (rigid body) कहा जाता है।

घूर्णन गति वह गति है जिसमें ढृढ़ वस्तु एक निश्चित अक्ष पर घूमती है। घूर्णन गति में वस्तु के भिन्न-भिन्न भागों की रैखिक गति (linear motion) भिन्न-भिन्न होती है। अक्ष के निकट स्थित कणों का रैखिक वेग कम और अक्ष से दूर स्थित कणों का रैखिक वेग अधिक होता है, परतु वस्तु के प्रत्येक कण का कोणीय वेग (angular velocity) एकसमान रहता है।

 

  • कोणीय संवेग (Angular Momentum) -

किसी दिए गए अक्ष के परितः किसी वस्तु का कोणीय संवेग, वस्तु के सभी कणों के रैखिक संवेग (linear momentum) का दिए गए अक्ष के परितः आघूर्णों के योगफल को कहते हैं।

किसी वस्तु का कोणीय संवेग = वस्तु का जड़त्व-आघूर्ण x कोणीय वेग।

कोणीय संवेग एक सदिश राशि है जिसकी दिशा कोणीय वेग की दिशा में (अर्थात घूर्णन तल के लंबवत दिशा में) होती है। सदिश संकेत में, \vec {L} = \vec {r} x \vec {p}

कोणीय संवेग का SI मात्रक kg m^{2} s^{-1} या Js होता है तथा इसकी विमाएँ (dimensions) M L^{2} T^{-1} होती हैं।

 

  • कोणीय संवेग के संरक्षण का सिद्धांत (Principle of Conservation of Angular Momentum)-

हम जानते हैं कि - [ बल आघूर्ण तथा कोणीय वेग में सम्बन्ध ] –

て = \frac {dL}{dt}

यदि て= 0, तो उपर्युक्त समीकरण से,

\frac {dL}{dt}  = 0  या L = नियतांक

अतः, किसी अक्ष के परितः घूर्णन करनेवाली वस्तु पर यदि कोई बाह्य बल-आघूर्ण (torque) कार्य नहीं करे तो वस्तु का कोणीय संवेग (angular momentum) समय के सापेक्ष नियत रहता है। इसे कोणीय संवेग के संरक्षण का सिद्धांत (principle of conservation of angular momentum) कहते हैं।

 

  • लंबवत अक्षों का प्रमेय (Theorem of Perpendicular Axes)

लंबवत अक्षों का प्रमेय - "किसी समतल पटल (lamina) के तल में स्थित दो परस्पर लंबवत अक्षों के परितः पटल के जड़त्व-आघूर्ण का योगफल इन अक्षों के कटान-बिंदु से गुजरनेवाले तथा तल के लंबवत अक्ष के परितः पटल के जड़त्व-आघूर्ण के बराबर होता है।"

मान लिया कि किसी समतल पटल (plane lamina) के तल में ox और OY दो परस्पर लंबवत अक्ष हैं तथा OZ एक अक्ष है जो OX और OY के कटान-बिंदु (point of intersection) 0 से पटल के तल के लंबवत गुजरता है (चित्र)।

 

यदि OX, OY तथा OZ के परितः पटल के जड़त्व-आघूर्ण क्रमशः I, I, तथा I, हों, तो इस प्रमेय के अनुसार –

I_{x} + I_{y} = I_{z}

प्रमाण – मान लिया कि OZ अक्ष से r दूरी पर एक बिंदु P है, जहाँ m द्रव्यमान का एक कण स्थित है। मान लिया कि Ox और OY अक्षों से बिंदु P की दूरियाँ क्रमशः y और x हैं।

अक्ष OX के परितः इस कण का जड़त्व-आघूर्ण = my^{2} तथा OY एवं OZ अक्षों के परितः इस कण के जड़त्व-आघूर्ण क्रमशः m x^{2} और m r^{2} होंगे।

अतः, अक्ष OX के परितः समतल पटल का जड़त्व-आघूर्ण I_{x} = ∑ m y^{2}

और OY के परितः जड़त्व-आघूर्ण I_{y} = ∑ m [latex]x^{2}

इसी प्रकार OZ के परितः पटल का जड़त्व-आघूर्ण I_{z} = ∑ mr^{2}

अब,  I_{x} + I_{y} = ∑ my^{2} + ∑ mx^{2} = ∑ m(y^{2} + x^{2} )

परंतु,    y^{2} + x^{2}   = r^{2}

I_{x} + I_{y} = ∑ mr^{2} = I_{z}

अर्थात,         I_{z} = I_{x} + I_{y}

 

  • समांतर अक्षों का प्रमेय (Theorem of Parallel Axes) -

"किसी अक्ष के परितः किसी पिंड के जड़त्व-आघूर्ण का मान पिंड के द्रव्यमान-केंद्र से गला समांतर अक्ष के परितः पिंड के जड़त्व-आघूर्ण और उसके द्रव्यमान तथा दोनों समांतर असे बीच की दूरी के वर्ग के गुणनफल के योग के बराबर होता है।" [नोट : यहाँ इस प्रमेय का प्रमाण समतल पटल के लिए

AL दिया जा रहा है, परंतु यथार्थ में यह सभी प्रकार के पिंडों के लिए मान्य है।]

मान लिया कि M द्रव्यमान वाले एक समतल पटल (plane lamina) का किसी अक्ष AB के परितः जड़त्व-आघूर्ण । है और पटल के द्रव्यमान केंद्र G से AB के समांतर गुजरनेवाले अक्ष CD के परितः पटल का जड़त्व-आघूर्ण I_{c} है।

 

यदि समांतर अक्षों AB और CD के बीच की Bl लांबिक दूरी a हो (चित्र ), तो समांतर अक्षों के प्रमेय से, I = I_{c} + M a^{2}

प्रमाण मान लिया कि पटल के बिंदु P पर, जिसकी दूरी अक्ष CD से है, m द्रव्यमान का एक कण स्थित है। अब, अक्ष AB के परितः इस कण का जड़त्व- आघूर्ण

m (OP)^{2} = m (a+.x)^{2} = m a^{2} + 2max + mx^{2}

.: पूरे पटल का AB के परितः जड़त्व-आघूर्ण

I = ∑m a^{2} + ∑2max + ∑m x^{2} = a^{2}∑m + 2a∑mx + ∑m x^{2}

परंतु, अक्ष CD के परितः पटल का जड़त्व-आघूर्ण

I_{c} = ∑m x^{2}

I = Ma^{2} + 2a∑mx + Ic                     [::∑m = M]

उपर्युक्त व्यंजक में ∑mx पटल के सभी कणों के द्रव्यमान का CD के परितः आघूर्णी (moments) के योग का मान देता है। CD, पटल के द्रव्यमान-केंद्र से होकर गुजरता है। चूंकि पटल द्रव्यमान-केंद्र G के परितः संतुलित है, इसलिए G से जाते हुए किसी अक्ष के परितः पटल के सभी कणों के द्रव्यमान के आघूर्णों का बीजीय योग (algebraic sum) शून्य होगा। अर्थात, ∑mx = 0

I = I_{c}</strong> <strong> + Ma^{2}</strong> <strong>

[note : समीकरण से स्पष्ट है कि किसी वस्तु का उसके द्रव्यमान-केंद्र से होकर जानेवाले अक्ष

(a = 0) के परितः जड़त्व-आघूर्ण किसी अन्य समांतर अक्ष (a + 0) के परितः जड़त्व-आघूर्ण से हमेशा कम होता है।]

 

  • किसी दृढ़ पिंड का संतुलन (Equilibrium of a Rigid Body)-

किसी पिंड को दृढ़ (rigid) तब कहा जाता है जब इसपर आरोपित किसी भी प्रबलता (strength) के बल के कारण उसकी आकृति (shape) एवं आकार (size) में थोड़ा भी परिवर्तन नहीं हो। दृढ़ पिंड मूलतः आदर्श अभिकल्पना (ideal concept) है। दृढ़ पिंड की व्यापक गति में रैखिक गति (translational motion) तथा घूर्णन गति (rotational motion) दोनों प्रकार की मिलीजली गति होती है। इनके लिए दो अलग-अलग समीकरण प्रयुक्त होते हैं |

रैखिक गति के लिए \vec {F_{ext}} = M \vec {a_{CM}}

इसी प्रकार घूर्णन गति के लिए बाह्य टॉर्क \vecて_{ext} = I \vec {a}

अब यहाँ दृढ़ पिंड के संतुलन के दोनों समीकरणों पर अलग-अलग विचार करेंगे।

किसी दृढ़ पिंड को संतुलन में होने के लिए निम्नलिखित दो शर्तों (conditions) का मान्य (valid) होना अत्यावश्यक है

(i) जड़त्वीय निर्देश फ्रेम के सापेक्ष दृढ़ पिंड के द्रव्यमान-केंद्र के रैखिक त्वरण (linear

acceleration) \vec {a}_{cm} को शून्य होना चाहिए, तथा

(ii) इसी निर्देश फ्रेम में किसी नियत अक्ष (fixed axis) के परितः दृढ़ पिंड का कोणीय

त्वरण (angular acceleration) \vec {a} भी शून्य होना चाहिए।

शर्त (i) के अनुसार, सूत्र \vec {F}_{ext} = M \vec {a}_{cm} = M x \vec {0} = \vec {0}

अर्थात \vec {F}_{ext} = \vec {F}_{1} + \vec {F}_{2} + \vec {F}_{3} + ..............= \vec {0}   .........(a)

अतः, संतुलन में बाह्य बलों का सदिश योगफल शून्य होना चाहिए।

 

सदिश समीकरण (1) को इसके तीनों घटक (component) में व्यक्त करने पर निम्नलिखित अदिश समीकरण (scalar equations) प्राप्त होते हैं

(F_{ext})_{x} = F_{1x} + F_{2x} + F_{3x} + ........ = 0     ...........(b)

(F_{ext})_{y} = F_{1y} + F_{2y} + F_{3y} + ........ = 0    ............ (c)

(F_{ext})_{z} = F_{1z} + F_{2z} + F_{3z} + ........ = 0     ............(d)

समीकरण (a),(b),(c) के अनुसार दृढ़ पिंड के संतुलन के लिए बलों के घटकों का योगफल प्रत्येक परस्पर लंबवत अक्षों के अनुदिश शून्य होना चाहिए।

शर्त (ii) के अनुसार, कोणीय त्वरण \vec {a} = \vec {0}

अब घूर्णन गति के लिए टॉर्क \vec {て} = I \vec {a}  = \vec {0}

अर्थात, = 1 + 2 + 13 + ... = 0

\vec {て}  = \vec {て} _{1} + \vec {て}_{2} + \vec {て} _{3} + ...... = \vec {0} ....... (e)

सदिश समीकरण (d) को तीन सदिश समीकरणों में व्यक्त करने पर,

て_{x} = て_{1x} + [latex]て_{2x} + ... = 0      .......... (f)

て_{y} = て_{1y} + [latex]て_{2y} + ... = 0   ....(g)

て_{z } = て_{1z} + [latex]て_{2z} + ...= 0   ......(h)

इस प्रकार दृढ़ पिंड के संतुलन के लिए समीकरण (b),(c),(d),(f),(g),(h) तथा में दिए गए छः स्वतंत्र शर्तों (six independent conditions) को मान्य होना चाहिए।

 

  • घूर्णन त्रिज्या (Radius of Gyration) –

किसी दिए गए घूर्णन अक्ष के परितः किसी वस्तु की घूर्णन त्रिज्या घूर्णन त्रिज्या घूर्णन अक्ष से वह दुरी है जिसके वर्ग को वस्तु के कुल द्रव्यमान से गुणा करने पर उस वस्तु का दिए गए अक्ष के परितः जड़त्व आघूर्ण प्राप्त हो जाता है |

यदि किसी वस्तु का द्रव्यमान M और दिए गए घूर्णन अक्ष के परितः उसका जड़त्व आघूर्ण I तथा घूर्णन त्रिज्या K हो, तो

I = M K^{2}

I = ∑m r^{2}

M K^{2} = ∑m r^{2}

घूर्णन त्रिज्या की विमा [ L ] होती है | इसका मात्रक C.G.S पद्धति में सेमी तथा M.K.S या S.I पद्धति में मीटर है |

 

  • अचल अक्ष के परितः घूर्णी गतिकी (Kinetic Energy of a immovable axis)

घूर्णी जाति के कारण किसी वस्तु की गतिज ऊर्जा, उसके विभिन्न  कणों की गतिज ऊर्जा के योग के बराबर होती है।

मान लिया कि PQ एक  ढृढ़  वस्तु है जो एकसमान   कोणीय वेग (angular velocity) ω से घूर्णन-अक्ष AB के परितः घूम रही है। मान लिया कि वस्तु के विभिन्न कणों के द्रव्यमान m_{1} , m_{2} , m_{3} , ... हैं तथा अक्ष AB से इन कणों की दूरियाँ क्रमशः r_{1} , r_{2} , r_{3} , ... हैं (चित्र 8.11)।

सभी कणों का कोणीय वेग वस्तु के कोणीय वेग के बराबर होगा। यदि कणों के रैखिक वेग (linear velocity) क्रमशः V_{1} , V_{2} , V_{3} , ... हों,

तो m द्रव्यमान के कण की गतिज ऊर्जा = \frac{1}{2} m_{1} v_{1}^{2}

पूरी वस्तु की गतिज ऊर्जा = सभी कणों की गतिज ऊर्जाओं का योग

या E_{k} = \frac{1}{2} m_{1} v_{1}^{2} + \frac{1}{2} m_{2} v_{2}^{2} + \frac{1}{2} m_{3} v_{3}^{2}   + ..............

= \frac{1}{2} m_{1} r_{(1ω)}^{2} + \frac{1}{2} m_{2} r_{(2ω)}^{2} + \frac{1}{2} m_{1} r_{3ω}^{2} + ............

[: v=ro; :: Vi = 10, V2 = r20 इत्यादि]

\frac{1}{2}[m_1r_{1}^{2} + [latex]m_{1}r_{2}^{2} + m_{3}r_{3}^{2} + .....] ω^{2}

\frac{1}{2}(∑mr^{2}) ω^{2} = \frac{1}{2} I ω^{2}

जहाँ ∑m r^{2} = I, वस्तु का घूर्णन-अक्ष AB के परितः जड़त्व-आघूर्ण।

E_k = \frac{1}{2} I{ω}^{2}

अतः समीकरण  से स्पष्ट है की, जड़त्व-आघूर्ण संख्यात्मक रूप से (numerican गतिज ऊर्जा के दुगने के बराबर होता है यदि वस्तु घूर्णन-अक्ष के पर (unit angular velocity) से घूम रही हो।

 

  • स्थान्तरीय गति या रैखिक गति और घूर्णन गति में तुलना ( Comparison of Translatory andRotatory Motion) –

  • लोटनिक गति (ROLLING MOTION) -

जब कोई गोलिय आकृति की वस्तु क्षैतिज समतल पर पूर्णतः लोटनिक गति (pure rolling motion) करती है तो वस्तु का समतल के साथ संस्पर्श (contact) मात्र एक बिंदु पर होता है और यह संस्पर्श बिंदु सतह पर फिसलता नहीं (does note slip) बल्कि सतह के सापेक्ष स्थिर रहता है और स्थितिज घर्षण (static friction) का अनुभव करता है |

लोटनिक गति घूर्णन एवं स्थानांतरण का संयोजन है।

उदाहरण - यातायात में इस्तेमाल होने वाले सभी पहियों की गति लोटनिक गति होती है।

चित्र - एक समतल सतह पर एक चकती की (बिना फिसले) लोटनिक गति। ध्यान दें कि किसी भी क्षण पर चकती का, सतह पर संपर्क बिन्दु P. विरामावस्था में है। चकती का द्रव्यमान केन्द्र ५ वेग से चलता है। चकतीC से गुजरती अक्ष के परितः कोणीय वेग 0 से घूर्णन करती है। V_{Ro}, जहाँ R चकती की त्रिज्या है।

माना, v_{cm} द्रव्यमान केन्द्र का वेग और इसलिए चकती का स्थानांतरीय वेग है। क्योंकि लोटनिक गति करती चकती का द्रव्यमान केन्द्र इसका ज्यामितीय केन्द्र है (चित्र), v_{cm}  बिन्दु C का वेग है। यह समतल सतह के समान्तर है। चकती की घूर्णी गति, C से गुजरने वाली सममित अक्ष के परितः है। अतः चकती के किसी बिन्दु P_{0} , P_{0} , या P_{0} , के वेग के दो अवयव हैं - एक स्थानांतरीय वेग v_{cm} और दूसरा घूर्णन के कारण रेखीय वेग v_{r} , v_{r} का परिमाण है v_{r} =rω, जहाँ अक्ष के परितः चकती के घूर्णन का कोणीय वेग है और r बिन्दु की घूर्णन अक्ष से (यानि C से) दूरी है। वेग v_{r} की दिशा C और बिन्दु को मिलाने वाले त्रिज्या सदिश के लम्बवत् हैं। चित्र में बिन्दु P_{2} , का वेग (v_{2} ,) और इसके अवयव v_{r} , एवं v_{cm} ... दर्शाये गए हैं। v_{r}, CP_{2} , के लम्बवत् है। यह दर्शाना आसान है कि v_{2} रेखा P_{0} P_{2} , के लम्बवत् है। अत: P से गुजरने वाली तथा ω के समांतर रेखा के तात्क्षणिक घूर्णी अक्ष कहते हैं।

P_{0} पर, घूर्णन के कारण रेखीय वेग v_{r} , स्थानांतरीय वेग v_{cm} के ठीक विपरीत दिशा में है और यह V_{r} = Rω, जहाँ R चकती की त्रिज्या है। यह शर्त कि P_{0} तात्क्षणिक रूप से विरामावस्था में है,

अतः किसी चकती (या बेलन) की बिना फिसले लोटनिक गति की शर्त है, V_{cm} = Rω

प्रसंगवश, इसका अर्थ यह हुआ कि चकती के शीर्ष बिन्दु P_{1} के वेग (v_{1} ) का परिमाण है v_{cm} + Rω या 2 v_{cm} और इसकी दिशा समतल सतह के समानान्तर है।

यह शर्त  वलय या गोले जैसी लोटनिक गति करती दूसरी सममित वस्तुओं पर भी लागू होती है।

 

  • लोटनिक गति के लिए गतिज ऊर्जा -

लोटनिक गति करते पिण्ड की गतिज ऊर्जा के लिए व्यंजक –

लोटनिक गति की गतिज ऊर्जा को स्थानांतरण की गतिज ऊर्जा और घूर्णन की गतिज ऊर्जा में पृथक्कृत किया जा सकता है। यह कणों के निकाय के इस व्यापक निष्कर्ष की विशिष्ट स्थिति है, जिसके अनुसार हम निकाय की गतिज ऊर्जा (K) को द्रव्यमान केन्द्र की गतिज ऊर्जा (M V^{2}/2 और निकाय के द्रव्यमान केन्द्र के परितः गति की गतिज ऊर्जा (K) के योग के रूप में देखते हैं। अर्थात्    K = K' + M V^{2}/2

द्रव्यमान केन्द्र की गतिज ऊर्जा, पिण्ड के स्थानांतरण की गतिज ऊर्जा है।

जो हमारी सांकेतिक भाषा में mv^{2}_{cm}/2 है जहाँ m दृढ़ पिण्ड का द्रव्यमान है तथा v_{cm} द्रव्यमान केन्द्र की गति है। चूंकि पिण्ड की द्रव्यमान केन्द्र के परितः घूर्णी गति है अत: K' घूर्णन गतिज ऊर्जा है। एक दृढ़ पिण्ड के लिए, K'=1 ω^{2}/2 है, जहाँ I एक सरोकारी अक्ष के परितः पिण्ड का जड़त्व आघूर्ण है, जो लोटनिक गति करती चकती के लिए पिण्ड का सममित अक्ष है।

इसलिए लोटनिक गति करते पिण्ड के लिए –

K = \frac {1}{2} Iω^{2} + \frac {1}{2} mv^{2}_{cm}

I = mk^{2} प्रतिस्थापित करें तो,

K = \frac {1}{2} \frac {mk^{2} v^{2}_{cm}}{R^2} + \frac {1}{2} mv^{2}_{cm}

या

K = \frac {1}{2} mv^{2}_{cm} 1+ \frac {k^{2}}{R^{2}}     ........(1)

समीकरण (1) न केवल चकती या बेलन के लिए लागु होता है, वरन इसे वलय या गोले के लिए भी लागु  किया जा सकता है।                   

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