chapter 5- laws of motion गति के नियम -class 11 physics notes in Hindi

अरस्तू की भ्रामकता

अरस्तू का यह दृष्टिकोण, कि किसी पिण्ड की एकसमान गति रखने के लिए बल आवश्यक है, गलत है। व्यवहार में विरोधी घर्षण बल को प्रभावहीन करने के लिए कोई बल आवश्यक होता है। हम यहाँ अरस्तू के गति के नियम को इस प्रकार लिख सकते हैं : किसी पिण्ड को गतिशील रखने के लिए बाह्य बल की आवश्यकता होती है।

अरस्तू का गति का नियम दोषयुक्त है।

उदाहरण – 

अपनी सामान्य खिलौना कार (अवैद्युत) से फर्श पर खेलती छोटी बालिका भी अपने अंतर्ज्ञान से यह जानती है कि कार को चलती रखने के लिए उस पर बंधी डोरी का स्थायी रूप से कुछ बल लगाकर बराबर खींचना होगा । यदि वह डोरी को छोड़ देती है तो कुछ क्षण बाद कार रुक जाती है। अधिकांश स्थलीय गतियों में यही सामान्य अनुभव होता है। पिण्डों को गतिशील बनाए रखने के लिए बाह्य बलों की आवश्यकता प्रतीत होती है। स्वतंत्र छोड़ देने पर सभी वस्तुएं अंततः रुक जाती हैं।

फिर अरस्तू के तर्क में क्या दोष है ? इसका उत्तर है : गतिशील खिलौना कार इसलिए रुक जाती है कि फर्श द्वारा कार पर लगने वाला बाह्य घर्षण बल इसकी गति का विरोध करता है। इस बल को निष्फल करने के लिए बालिका को कार पर गति की दिशा में बाह्य बल लगाना पड़ता है। जब कार एकसमान गति में होती है तब उस पर कोई नेट बाह्य बल कार्य नहीं करता; बालिका द्वारा लगाया गया बल फर्श के बल (घर्षण बल) को निरस्त कर देता है।

इसका उपप्रमेय है : यदि कोई घर्षण न हो, तो बालिका को खिलौना कार की एकसमान गति बनाए रखने के लिए, कोई भी बल लगाने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

 

  • जड़त्व (Inertia):

जड़त्व या जड़ता वस्तु का वह गुण है जिसके कारण स्थिर वस्तु स्थिर ही रहना चाहती है तथा गतिमान वस्तु समरूप वेग से ही चलना चाहती है।

जड़ता तीन प्रकार के हैं :

(i) स्थिर जड़ता (Inertia of rest)

(ii) गतिज जड़ता (Inertia of motion)

(iii) दिशा का जड़त्व (Inertia of direction)

 

(i) स्थिर जड़ता (Inertia of rest) :-   स्थिर जड़ता वस्तु का वह गुण है जिस गुण के कारण वस्तु स्थिर की स्थिति में रहना चाहती है । उदाहरण-  यात्री बस पर बैठा है । अगर बस एकाएक चल देती है तो यात्री पीछे की ओर झुक जाता है । ऐसा इसलिए होता है कि बस के चलने पर यात्री का निचला भाग गति में आ जाता है । लेकिन उसका ऊपर वाला भाग स्थिर की स्थिति में ही रहना चाहता है ।

(ii) गतिज जड़ता (Inertia of motion) :-   गतिज जड़ता वस्तु का वह गुण है जिस गुण के कारण वस्तु अगर गति में है तब उसी पथ पर वह समरूप गति में बना रहना चाहती है ।  उदाहरण :- जब गतिशील बस एकाएक रुकती है तब यात्री आगे की ओर झुक जाता है । ऐसा इसलिए होता है कि यात्री का निचला भाग एकाएक बस के साथ (बस के रुकने पर) स्थिर हो जाता है जबकि यात्री का ऊपर वाला भाग गति की स्थिति में ही रहना चाहता है।

(iii) दिशा का जड़त्व  (Inertia of direction) : यह वस्तु का वह गुण  है जिस गुण के कारण वस्तु अपनी गति की ही दिशा में रहना चाहती है ।

उदाहरण –   (a) जब कोई पहिया (Wheel) तीव्र गति से चक्कर काटता है तब इसमें लगे हुए कीचड़ (Mud) स्पर्शीय रूप से (Tangentially) छिटकते हैं    । दिशा के जड़त्व के कारण ऐसा होता है । ..

(b) जब कोई गतिशील वाहन (Running vehicle) एकाएक किसी मोड़ पर (Turn) घूमता है तब वाहन पर सवार यात्री धक्का (Jerk) का अनुभव करते हैं । ऐसा इसलिए होता है क्योंकि यात्री अपनी गति (वाहन की गति) की (दिशा के जड़त्व के कारण) रहना चाहते हैं।

 

  • बल (Force):

बल एक ऐसा साधन (Devine) है जो स्थिर वस्तु को गति में लाता है, गतिशील वस्तु को रोक देता है (जब बल वस्तु पर उसकी गति के विपरीत दिशा में कार्य करता है), गतिशील वस्तु की गति को बढ़ा देता है (जब बल वस्तु पर उसकी गति की दिशा में कार्य करता है) और वस्तु की गति की दिशा को बदल देता है ।  उदाहरण – जब हम जमीन पर रखे हुए गेंद को (Push) धक्का देते हैं तब गेंद जमीन पर लुढ़कना प्रारम्भ करता है । इस तरह बल गेंद में गति प्रदान करता हैं ।

  • संवेग (Momentum):

किसी पिण्ड के द्रव्यमान और उसके वेग का गुणनफल उस पिण्ड का संवेग कहलाता है ।

संवेग = mv

C .G. S. पद्धति में संवेग का मात्रक ग्राम सेमी प्रति सेकेण्ड तथा S.I. पद्धति में किग्रा मी प्रति सेकेण्ड है।

 

  • न्यूटन के गति के नियम :-

सर आइजक न्यूटन ने सन् 1686 ई० में अपनी प्रसिद्ध पुस्तक प्रीन्सिपिया (Principia) में पहली बार इन नियमों को लिखा । ये नियम न्यूटन के गति नियम कहलाते हैं ।

(a) गति का प्रथम नियम (First law of motion)- अगर कोई पिण्ड स्थिर है तो स्थिर ही रहेगा या समरूप वेग से एक सरल रेखा पर गतिशील है तो उसी वेग से उसी सरल रेखा पर तबतक गतिशील रहेगा जबतक उस पिण्ड पर कोई असंतुलित (Unbalanced) बल लगकर उसकी वर्तमान अवस्था में परिवर्तन न ला दे।

या

यदि किसी कण पर  लगनेवाली सभी बलों  का सदिश योगफल शून्य हो, तब वह कण अत्वरित अवस्था (unaccelerated अर्थात या तो कण विराम में रहता है अथवा नियत वेग से गतिशील रहता है। of all the forces acting on a particle is zero then the particle is said to be una i.e., remains at rest or moves with constant velocity.)

स्पष्टतः, किसी कण की अत्वरित अवस्था, अर्थात विराम या एकसमान वेग का उसपर आरोपित बलों का सदिश योगफल अवश्य ही शून्य है।

 

(b) न्यूटन के गति का द्वितीय नियम ( Newton Second Law of Motion)-

संवेग में परिवर्तन की दर लगाये गये असंतुलित बल का अनुक्रमानुपाती होता है और यह परिवर्तन हमेशा बल की दिशा में होता है।

या

वस्त के संवेग-परिवर्तन की दर उसपर आरोपित बल के समानुपाती होती है तथा उसी दिशा में होता है जिस दिशा में बल लगता है।” (The rate of change of mof a body is proportional to the applied force and takes place in the directionmomentum of a body in which the force acts.)

\vec{F} = k m \vec{a}

जहा आरोपित बल \vec{F},  वस्तु के द्रव्यमान (m) तथा उसके त्वरण ( \vec{a} ) के गुणनफल का समानुपाती होता है |

बल का S.I. मात्रक न्यूटन (प्रतीक N) है : 1 N = 1 kg ms-2

द्वितीय नियम तथा प्रथम नियम में सामंजस्य है (F = 0 का अर्थ है a = 0)

 

(c) न्यूटन के गति  का तृतीय  नियम :- जब एक पिण्ड दूसरी पिण्ड पर कोई बल लगाता है तो दूसरा पिण्ड भी पहले पिण्ड पर उतना ही बल विपरीत दिशा में लगाता है । दूसरे शब्दों में, प्रत्येक क्रिया की बराबर परन्तु उसके विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है ।

या

क्रिया के बराबर एवं उसके विपरीत हमेशा एक प्रतिक्रिया होती है।” (To every There is always an equal and opposite reaction.)

 

  • गति के तीसरे नियम की व्याख्या :-

इस  नियम के अनुसार क्रिया और प्रतिक्रिया परिमाण में बराबर तथा दिशा में एक-दूसरे के विपरीत होते हैं । क्रिया और प्रतिक्रिया हमेशा अलग-अलग वस्तुओं पर लगती है ।

उदाहरण :-

बन्दूक से गोली चलाने पर बन्दूक चलानेवाले को पीछे की ओर धक्का लगता है । इसका कारण यह है कि बन्दूक छोड़ने पर बारूद एकदम गैस बन जाती है जो कि फैलने के कारण गोली को बहुत जोर से आगे की ओर फेंक देती है । गोली भी इस गैस पर उतनी ही प्रतिक्रिया बल विपरीत दिशा में लगाती है जिससे बन्दूक चलानेवाले को पीछे की ओर धक्का लगता है ।

 

  • न्यूटन के गति का पहला तथा तीसरा नियम, दूसरा नियम में निहित है (Newton’s first and third laws of motion are limiting cases of the second law):–  न्यूटन के गति के दूसरे नियम से –

बल = द्रव्यमान * त्वरण

अगर बल F = 0, तो त्वरण a = 0 चूँकि द्रव्यमान शून्य नहीं हो सकता है।

वेग परिवर्तन परन्तु

त्वरण = \frac{ वेग परिवर्तन }{ समय }

0 = \frac{ वेग परिवर्तन }{ समय }

..                   वेग परिवर्तन = 0 या, वेग नियत है।

इससे स्पष्ट है कि यदि किसी वस्तु पर परिणामी बल शून्य है, तो उसका त्वरण शून्य होता है यानि उसका वेग निहित होता है । यही न्यूटन के गति का पहला नियम है ।

माना कि एक निकाय के दो भाग a और b हैं।

यह भी माना कि प्रथम भाग a द्वितीय भाग b पर क्रियात्मक बल F. आरोपित करता है। जिसके फलस्वरूप भाग b, भाग a पर

प्रतिक्रियात्मक बल \overrightarrow{\mathrm{F}}_{a b} आरोपित करता है । यदि संयुक्त निकाय को कोई त्वरित गति नहीं है, तो न्यूटन के दूसरे नियम से वस्तु पर बाह्य बल अनुपस्थित रहता है, अर्थात्

\vec{F} = \overrightarrow{\mathrm{F}}_{a b} + \overrightarrow{\mathrm{F}}_{b a} = 0

स्पष्ट है कि \overrightarrow{\mathrm{F}}_{a b} तथा \overrightarrow{\mathrm{F}}_{b a} के परिमाण बराबर हैं । यही न्यूटन के गति का तीसरा नियम है।

  • बल की परिभाषा :-

किसी पिण्ड की पहली अवस्था तबतक नहीं बदलती है जबतक कि कोई बाहरी बल उस पिण्ड पर लगकर उसे उस अवस्था (स्थिर की अवस्था या समरूप गति से एक सरल रेखा पर गति की अवस्था) को बदल न दे । अतः बल उसे कहते हैं जो किसी वस्तु की प्रारम्भिक स्थिति को बदल देता है या बदलने का प्रयास करता है ।

F = ma

बल = द्रव्यमान x त्वरण

  • बल का मात्रक (Unit of force) :-

से० ग्राम से० पद्धति में बल के मात्रक को डाइन तथा मी० कि० से० या S.I. पद्धति में बल के मात्रक को न्यूटन कहते हैं ।

 

  • डाइन (Dyne) :- “डाइन” यूनानी शब्द डुनामीस (Dunamis) से बना है जिसका अर्थ है बल । उतना बल को एक डाइन का बल कहते हैं जितना बल एक ग्राम पर लगकर उसमें एक सेण्टीमीटर प्रति सेकेण्ड प्रति सेकेण्ड का त्वरण उत्पन्न करता है ।

1 डाइन = 1 ग्राम x 1 सेण्टीमीटर प्रति सेकेण्ड^2

 

  • न्यूटन (Newton) :- उतना बल को एक न्यूटन का बल कहते हैं जितना बल एक किलोग्राम पर लगकर उसमें एक मीटर प्रति सेकेण्ड प्रति सेकेण्ड का त्वरण उत्पन्न करता है ।

1 न्यूटन = 1 किलोग्राम x 1 मीटर/सेकेण्ड

 

  • बल की विमा तथा उसके अनुसार इसका मात्रक :-

बल = द्रव्यमान x त्वरण = [M] x \left[\mathrm{LT}^{-2}\right] = \left[\mathrm{MLT}^{-2}\right] G.G.S. पद्धति में बल का मात्रक ग्राम सेमी सेकेण्ड-2 (gm. cm. s-2) तथा M.K.S. या S.I. पद्धति में बल का मात्रक किग्रा मीटर सेकेण्ड-2 (kg. ms-2) है।

 

  • प्रेरण या आवेग (Impulse):-

बल और उसके लगने के समय के गुणनफल को प्रेरण कहा जाता है । अगर बल का मान F हो तथा यह किसी पिण्ड पर । समय तक लगता हो, तो

प्रेरण = Ft

F= बल = द्रव्यमान ४ त्वरण

यानि F= ma = m

Ft = mv-mu

(mv– mu) संवेग परिवर्तन है । अतः प्रेरण पिण्ड में संवेग के परिवर्तन के बराबर होता है।

आवेग का मात्रक G. G. S. पद्धति में डाइन सेकेण्ड तथा M.K. S. या S.I. पद्धति में न्यूटन सेकेण्ड है।

  • बल का आवेग (Impulse of a force) :-

जब कोई बडा बल किसी पिण्ड पर बहुत अल्प समय क्रियाशील होता है तो ऐसे आवेग को बल का आवेग कहते है ऐसा बल आवेगी बल (Impulsive force) कहलाता है । जबतक किसी पिण्ड पर आवेगी बल लगता है, तबतक पिण्ड का विस्था नगण्य होता है । जब क्रिकेट के गेंद पर बैट से आघात किया जाता तो बहुत अल्प समय तक गेंद पर बड़ा बल लगता है । ऐसी स्थिति गेंद का विस्थापन नगण्य होता है । बैट से अलग होते ही गेंद लगता हुआ बल लुप्त हो जाता है लेकिन प्राप्त वेग के कारण अपने संवेग से गतिमान रहता है ।

  • बन्दूक पर बल (Force on a gun) :-

             F = mnu

जहाँ m = गोली का द्रव्यमान

n = एकांक समय में छोड़ी गयी गोली की संख्या

u = बन्दूक के सापेक्ष गोली का वेग

 

  • रॉकेट का उड़ान (Rocket propulsion) : –

रॉकेट की उड़ान न्यूटन के गति के तीसरे नियम एवं संवेग संरक्षण नियम का सुन्दर उदाहरण है । रॉकेट अपनी पिछले भाग से गर्म  गैस को बल लगाकर बाहर निकालता है  यह बल क्रिया बल  (Action force) कहलाता है । गर्म गैस राकट पर बल आरोपित है जिससे रॉकेट आगे की ओर उड़ान भरता है । यह बल प्रति बल (Renction force) कहलाता है । संवेग की दृष्टि से गई पीछे की दिशा में संवेग प्राप्त करता है और राकट आगे की दिशा में समान संवेग प्राप्त करता है ।

 

  • रेखीय संवेग के संरक्षण का नियम :-

किसी बाह्य बल (External force) की अनुपस्थिति में दो या दो से अधिक पिण्ड के संवेगों का बीजगणितीय योग (Algebraic sum) किसी भी दिशा में हमेशा नियत रहता है । इसे संवेग संरक्षण का नियम या सिद्धान्त कहते हैं । संवेग संरक्षित (Conserved) है ।                           इस नियम को न्यूटन की गति के नियमों से प्राप्त किया जा सकता है जब इन्हें एक पिण्ड से अधिक निकाय के लिए सामान्यीकरण (Generalise) किया जाता है । (This law can be deduced from Newton’s laws of notion where generalised to a system of more than one particle or body.)

 

  • सहयोगी बल (Concurrent forces): .

सहयोगी बल उन बलों को कहते हैं जो एक बिन्दु पर क्रियाशील होते हैं । ये बल सन्तुलन में रहते हैं जब इनका परिणामी (Resultant) शून्य होता है । एक बिन्दु पर क्रियाशील दो बल सन्तुलन में होते हैं जब उनका मान बराबर और उनकी दिशा एक-दूसरे के विपरीत होती है ।

\overrightarrow{\mathrm{F}}_{1}   और \overrightarrow{\mathrm{F}}_{2}    दो बल 0 बिन्दु पर क्रियाशील है । उनका मान बराबर \overrightarrow{\mathrm{F}}_{1}  = \overrightarrow{\mathrm{F}}_{2}  है और उनकी दिशा एक-दूसरे से विपरीत है । इसलिए इनका परिणामी R = \overrightarrow{\mathrm{F}}_{1}   + (-\overrightarrow{\mathrm{F}}_{2} ) = शून्य ।

अत: \overrightarrow{\mathrm{F}}_{1}   और \overrightarrow{\mathrm{F}}_{2}   सहयोगी बल (Concurrent force) कहलाता है । अगर कोई पिण्ड सन्तुलन की स्थिति में है तो वह विराम की स्थिति में रह सकता है। पिण्ड पर कार्य करने वाले बल अगर सहयोगी हैं तो पिण्ड स्थिर की स्थिति में ही रहेगा। . अगर किसी पिण्ड पर दो, तीन या इनेक सहयोगी बल (\overrightarrow{\mathrm{F}}_{1},   \overrightarrow{\mathrm{F}}_{2}  , \overrightarrow{\mathrm{F}}_{3} , \overrightarrow{\mathrm{F}}_{4}    ……… ) कार्य करते हों तो पिण्ड स्थिर की स्थिति में ही रहेगी। \overrightarrow{\mathrm{F}}_{1}   + \overrightarrow{\mathrm{F}}_{2}   + \overrightarrow{\mathrm{F}}_{3}   +……… = 0

 

  • घर्षण (Friction) :

यदि किसी स्थिर ठोस वस्तु पर कोई दूसरी ठोस वस्तु इस तरह । से रखी जाती है कि दोनों समतल पृष्ठों एक-दूसरे को स्पर्श करते हैं, तो ऐसी दशा में दूसरी वस्तु को पहली वस्तु पर खिसकाने के लिए बल लगाना पड़ता है । इस बल का मान एक सीमा (Limit) से कम होने पर दूसरी वस्तु पहली वस्त पर नहीं खिसक सकती है । इस कथन से यह स्पष्ट है कि दोनों वस्तुओं के सम्पर्क तल पर एक बल गति के विपरीत दिशा में उत्पन्न हो जाता है जो दूसरी वस्तु की गति में विरोध करता है । इस विरोधी बल को ‘घर्षण’ कहते हैं । यह घर्षण पाठ के रूखड़ेपन पर निर्भर करता है  पृष्ठ के रूखड़ेपन के बढ़ने से  घर्षण का मान बढ़ता है।

  • विसर्पी (फिसलुआँ) तथा लुढ़कुआँ घर्षण (Sliding and rolling friction) :
  • विसर्पी (फिसलुआँ) घर्षण – (sliding friction)

कोई वस्तु किसी पृष्ठ पर या तो खिसकर चल सकती है या नाटक कर । जब वस्तु में खिसकने की गति रहती है तो उस समय गति के विपरीत दिशा में जो घर्पण का बल कार्य करता है उसे विसर्पी घर्षण (Slidling friction) कहते हैं |

 

  • लोटनिक घर्षण या लुढ़कुआँ घर्षण (rolling friction)

जब वस्तु में लुढ़कने की गति रहती है तो उस समय गति के विपरीत जो घर्पण का बल कार्य करता है उसे लुढ़कुआँ घर्षण (Rolling friction) कहते हैं ।

अनुभव से यह ज्ञान प्राप्त है कि एक भारी पीपे (barrel) को खिसकाकर ले जाने के बदले लुढ़काकर ले जाना आसान है । इससे स्पष्ट है कि लुढ़कुआँ घर्षण विसर्पी घर्षण से कम होता है ।

लोटनिक घर्षण गुणांक (coefficient of rolling friction) निम्नलिखित सूत्र से परिभाषित होता है ।   

μr = हैतिज समतल पर एकसमान लोटनिक गति बनाए रखने के लिए आवश्यक (p) / समतल सतह

\frac{ हैतिज समतल पर एकसमान लोटनिक गति बनाए रखने के लिए आवश्यक (p) }{ समतल सतह द्वारा लगाया गया अभिलंब बल (N) }

μr को कर्षक प्रतिरोध (tractive resistance) भी कहा जाता है।

 

  • विभिन्न सतहों के बीच लोटनिक घर्षण गुणांक (μr) के मान

 

संपर्की सतहों की प्रकृति .         —              लोटनिक घर्षण गुणांक (μr)

 

(i) इस्पात और इस्पातके बीच (Steel on steel)                          • 0.007-0.015

(ii) इस्पात और लकड़ी के बीच (Steel on wood)                                        • 0.06-0.10

(iii) वायुपूरित टायर और कंक्रीट सड़क के बीच                                                • 0.02-0.03

(Pneumatic tyres on concrete road)

(iv) वायुपूरित टायर और कीचड़ वाली सड़क के बीच                                          • 0.04-0.06

(Pneumatic tyres on muddy road)

(v) दृढ स्टील के चक्के और स्टील के रेल लाइन के बीच                                 • 0.0002-0.0005

(Hardened steel wheel on steel rails)

 

 

  • स्थिर घर्षण (Static friction ) –

अगर कोई वस्तु किसी पृष्ठ पर रहती है तो उसे खिसकाने के लिए बल को अवश्यकता होती है । अगर बल का मान बहुत कम रहता है तो वह वस्तु उस पृष्ठ पर नहीं खिसक सकती है । अत: जितना बल लगाने से वस्तु उस पृष्ठ पर नहीं खिसक पाती है, वह बल स्थिर घर्षण (Static friction) कहलाता है ।  

 

  • सीमित घर्षण (Limiting friction)

जब वस्तु के खिसकाने के लिए बल के परिणाम को बढ़ाया जाता है तो स्थिर घर्षण का परिमाण भी बढ़ता है । एक ऐसा समय आता है जब वस्तु पर एक खास बल लगाने से वस्तु ठीक-ठीक खिसकने-खिसकने पर हो जाती है । ऐसी स्थिति में घर्षण के कारण वस्तु पर गति के विपरीत दिशा में लगने वाले बल का मान अधिकतम हो जाता है । इस बल को सीमित घर्षण (Limiting हैं friction) कहते ।

 

  • गतिज घर्षण (Dynamic friction ) :-

किसी पृष्ठ पर रखी हुई वस्तु पर सीमित घर्षण के बराबर बल लगाने से यह वस्तु खिसकने-खिसकने पर हो जाती है । परन्तु खिसकने के बाद वस्तु के समरूप गति रखने के लिए इसपर एक बल लगाना पड़ता है जिस बल का मान सीमित घर्षण से कम होता है । अतः जिस बल के कारण कोई वस्तु किसी पृष्ठ पर समरूप गति में गतिशील रहती है इसे गतिज घर्षण (Dynamic friction) कहते हैं ।

 

  • घर्षण के नियम (Laws of friction) :-

घर्षण के नियम को ही प्रायः सीमित घर्षण का नियम (Laws of limiting friction) कहते हैं जिन्हें नीचे जैसे लिखा जाता है :

(i) घर्षण बल की दिशा वस्तु को खिसकाने वाले बल की – दिशा के विपरीत होती है। .

(ii) सीमित घर्षण बल स्पर्शी पृष्ठों के बीच अभिलम्ब प्रतिक्रिया (Normal reaction) का अनुक्रमानुपाती होता है । अगर सीमित घर्षण-बल F तथा अभिलम्ब प्रतिक्रिया R हो तो F« R होता है।

(iii) सीमित घर्पण-बल स्पर्शी पृष्ठों के क्षेत्र (Area) पर निर्भरनहीं करता है।

(iv) सीमित घर्षण-बल स्पर्शी पृष्ठों की प्रकृति (पृष्ठ के अली चिकनापन, पृष्ठ किस पदार्थ का बना है आदि) पर निर्भर करता है।

  • घर्षण गुणांक ( co-efficient of friction )-

किन्हीं दो सतहों के बीच सीमांत घर्षण बल (limiting frictional force) \vec{F} का मान उनके बीच अभिलंब प्रतिक्रिया \vec{R} के मान के समानुपाती होता है, अर्थात

F ∝ R  या F = μ R

जहाँ μ एक नियतांक है जिसे घर्षण गुणांक या सीमांत घर्षण गुणांक कहते हैं। यदि दो सतहों के बीच गतिज घर्षण बल \overrightarrow{\mathrm{F}}_{K} हो( \overrightarrow{\mathrm{F}}_{K} < F) तो गतिज घर्षण गुणांक

\overrightarrow{\mathrm{ μ }}_{k} = \frac{\overrightarrow{\mathrm{F}}_{K} }{r}

चूँकि सीमांत स्थैतिक घर्षण बल (limiting static friction) का मान गतिज घर्षण बल के मान से अधिक होता है, इसलिए सीमांत घर्षण गुणांक का मान भी गतिज घर्षण गुणांक से अधिक होता है। किंतु, दोनों का मान सामान्यतः 1 से कम होता है। . चूँकि घर्षण गुणांक एक ही प्रकार की दो राशियों का अनुपात है, इसलिए इसका न तो कोई मात्रक होता है और न ही कोई विमा (dimension) होती है।

  • घर्षणगुणांक का मान ज्ञात करना :-

घर्षण-गुणांक का मान दो विधियों से ज्ञात किया जाता है

(i) क्षैतिज तल विधि और

(ii) आनत तल विधि

आनत तल AB पर एक गुटका C रखा जाता है और तल को धीरे-धीरे इतना उठाया जाता है कि गुटका ठीक-ठीक खिसकने की स्थिति में हो जाये । इसकी जाँच तल को धीरे-धीरे ठोक कर की जाती है । माना कि ऐसी सीमित स्थिति में (जब गुटका ठीक-ठीक खिसकाने की स्थिति में है) आनत तल क्षैतिज के साथ Ө कोण बनाता है । गुटके के भार mg का अवयव mgcos Ө तल के लम्बवत् तथा mgsin Ө तल के समानान्तर होता है । इसलिए

μ = F / R = mgsin Ө/mgcos Ө = tan Ө = h / b

h और b का मान स्केल की मदद से मालूम करके घर्षण के गुणांक μ का मान मालूम कर लिया जाता है ।

 

* घर्षणकोण (Angle of friction) और विरामकोण (Angle of repose):-

(i) घर्षणकोण (Anglc of friction) :

घर्पण के कोण को भली-भाँति चित्र की मदद से समझाया जाता है | AB एक क्षतिज तख्ता है जिसपर m द्रव्यमान का एक गुटका C है । गुटके पर AB तल के समानान्तर एक ऐसा बल P लगाया जाता है जिसमें गुटका सीमित संतुलन (Limiting equilibrium) में रहता है । अभिलम्ब प्रतिक्रिया R गुटके के भार mg को संतुलित रखता है और सीमित घर्षण-बल F गुटके पर लगाए गए बल P को संतुलित रखता है । Rऔर F का परिणामी बल R’ है । यह परिणामी बल अभिलम्ब प्रतिक्रिया R से जो कोण बनाता है, उसी कोण को ‘घर्षण-कोण’ कहते हैं । इस कोण को घर्षण का सीमित कोण भी कहते हैं । चित्र से स्पष्ट है कि

F/R = tan入

F/R = μ = μ = tan入

 

(ii) विरामकोण (Angle of repose) : –

माना कि m द्रव्यमान का एक टुकडा C आनन्त तल AB पर है । तल AB का तिज के साथ झुकाव का मान धीरे-धीरे बढ़ाकर एक ऐसी स्थिति में लाकर रखा जाता है जिसमें यह क्षैतिज के साथ 0 कोण बनाता है । ऐसी स्थिति में गुटका ठीक-ठीक खिसकने की स्थिति में रहता है, तब 0 कोण को ही विराम–कोण कहा जाता है । ऐसी दशा में गुटका का भार mg ठीक नीचे की ओर क्रियाशील है । इस mg को एक अवयव mg cosӨ तल AB क लम्बवत् है जो अभिलम्ब प्रतिक्रिया R द्वारा संतुलित होता है । mg का दूसरा अवयव mg sinӨ तल के समानान्तर है जो गुटके को खिसकाने की चेष्टा करता है तथा सीमित घर्पण-बल F द्वारा संतुलित होता है ।

अतः,       F=mg sinӨ ;  R = mg cosӨ

μ  = F/R=mgsin Ө / mgcos Ө = tan Ө

F = μ R = μ mg cos Ө

जब mg sin Ө > mgcos Ө तव गुटका आनत तल पर नीचे की ओर खिसकेगा और जब mgsin Ө < μ mgcos Ө, तब गुटका नहीं खिसकेगा । जब mgsin Ө  = μ mgcos Ө तब गुटका चरम संतुलन की स्थिति में रहेगा । ऐसी स्थिति में μ = tan Ө  होता है ।

परन्तु

μ = tan入

: tan入= tan入

: 0 = ?

या, विराम कोण = घर्पण कोण ऊपर के कथनों को नीचे जैसे व्यक्त किया जा सकता है।

जब 0 >入, तब गुटका गति में रहेगा।

जब 0 <入, तब गुटका गति में नहीं रहेगा।

जब 0 =入, तब गुटका चरम संतुलन में रहेगा।

 

  • घर्षण की उत्पत्ति (Origin of friction) :

जिन-जिन बिन्दुओं पर आण्विक विलगाव (Molecular separation) कम होता है, वहाँ आकर्षण बल अधिक होता है । समान पदार्थों के अणुओं के बीच आकर्षण को ससंजन (Cohesion) कहते हैं तथा असमान पदार्थों के अणुओं के बीच आकर्षण को आसंजन (Adhesion) कहते हैं । जब एक पिण्ड दूसरे पर खिसकता है तब उनके स्पर्श बिन्दुओं पर अणुओं को अलग करने के लिए एक बल अवश्य लगाना होता है । एक पिण्ड को दूसरे पिण्ड पर गतिशील रखने के लिए (कुल आण्विक आकर्षण को समाप्त करने के लिए) आवश्यक बल ही घर्षण है।

 

  • तरल घर्षण (Fluid friction) :-

जब कोई पिण्ड किसी तरल (द्रव या गैस) में गतिशील रहता है तो वह सामने के तरल को मुख्यतः बगल की ओर विस्थापित करता है । तरल का कछ भाग पिण्ड को आगे की ओर बढ़ाता है । इससे तरल को तो वेग प्राप्त होता है लेकिन पिण्ड की गतिज ऊर्जा घट जाती है । ऊर्जा की यह कमी पिण्ड पर एक अवरोधक बल (Resistive force) उत्पन्न करता है । यह बल ‘तरल घर्षण’ कहलाता है ।

तरल घर्षण तरल के घनत्व पर भी निर्भर करता है । पानी की अपेक्षा हवा में घर्षण कम होता है । पिण्ड का वेग भी तरल घर्षण को प्रभावित करता है । अपेक्षाकत पिण्ड में कम वेग पर घर्षण-बल वेग के अनुक्रमानुपाती होता है और अधिक वेग पर घर्षण-बल वेग के वर्ग के अनुक्रमानुपाती होता है । जब पिण्ड का वेग ध्वनि के वेग के लगभग बराबर हो जाता है तो धारा-रेखीय पिण्ड के लिए घर्षण बल वेग के घन के अनुक्रमानुपाती होता है।

 

  • दैनिक जीवन में घर्षण का महत्त्व :-

घर्षण न हो तो हम न तो खड़े हो सकते हैं और न कोई वस्तु ही पकड़ सकते हैं । घर्षण के अभाव में सभी वस्तुएँ ऊँचाई से फिसलना शुरू करती हैं और गहरे गड्ढों में जा गिरती हैं जहाँ से वे कभी भी निकल नहीं पातीं । ऐसा होने से संसार में कोई भी वस्तु स्थिर नहीं रह गति के पाती । सभी वस्तुएँ गतिमान होती हैं और उनमें समुद्र में गिरने की प्रवृत्ति रहती है । इसलिए स्नानागारों का फर्श बहुत ही चिकना नहीं बनाना चाहिए जिससे हमेशा गिरने की सम्भावना बनी रहती है।

घर्षण के ही कारण हम पृथ्वी पर चल सकते हैं । बर्फ की चिकनाहट के कारण उसपर घर्षण बहुत कम होता है जिससे उसपर चलने में कठिनाई होती है । घर्षण के बिना इंजन गाड़ी को नहीं खींच सकता, कील और पेंच लकड़ी में नहीं टिक पाते, रस्सी के रेशे एक-दूसरे को दृढ़ता से नहीं थाम पाते, गाड़ी को रोकना और पेड़ पर चढ़ना असम्भव हो जाता तथा दीवाल के सहारे सीढ़ी रखकर चढ़ना भी सम्भव नहीं होता ।

 

* घर्षण कम करने की विधियाँ :-  (Methods of reducing friction):

(a) रूखड़ी सतह को चिकना करके :-

रूखड़ी सतह को रौंद कर चिकना किया जाता है । इससे सतह पर उभार (ऊँच-नीच) कम हो जाते हैं जिससे उनका फँसना (interlocking) घट जाता है । इससे घर्षण बल घट जाता है । लेकिन एक सीमा (Limit) से अधिक चिकना करने पर अन्तराण्विक (Intermolecular) बलों का प्रभाव बढ़ जाता है जिससे सतहों के बीच घर्षण बल फिर बढ़ने लगता है । अतः यह विधि ज्यादा रूखड़ी (Rough) सतहों के लिये ही उपयुक्त है ।।

(b) स्नेहक (Lubricant) के प्रयोग द्वारा :

ठोस सतहों के बीच घर्षण की अपेक्ष तरल एवं ठोस के बीच घर्षण [जिसे श्यानता (viscosity) कहते हैं] काफी कम होता है । अतः दो सतहों के बीच द्रव या तरल डाल देने से ठोसों का घर्षण घट जाता है ।

(c) सतहों को अशुद्ध करके :-

सतहों पर ऑक्साइड बना देने से कोल्ड वेल्डिंग (Cold welding) की संभावना काफी घट जाती है । अन्य अशुद्धियों द्वारा भी घर्षण घटाये जाते हैं ।

(d) पाउडर डालकर :-

महीन पाउडर डालने से सम्पर्क सतहों के बीच पाउडर के कण आ जाते हैं जो आसानी से सतह के साथ लुढ़कते जाते हैं । इससे घर्षण घट जाता है । कैरम बोर्ड की गोटी पाउडर डालने पर अधिक फिसलती है।

  • स्नेहन (Lubrications):-

रूखड़े सतहों के बीच ग्रीज या तेल डालने से घर्षण बहुत कम हो जाता है । इस क्रिया को स्नेहन (Lubrications) कहते हैं ।

 

  • वृत्ताकार पथ में नियत चाल से गति (Circular motion with constant speed): –

जब कोई पिण्ड किसी वृत्ताकार पथ पर नियत चाल से चलता है तो उसकी गति को नियत चाल की वृत्तीय गति कहते हैं । इसमें पिण्ड के वेग का परिमाण नियत रहता है, परन्तु गति की दिशा लगातार बदलती रहती है । अब क्योंकि पिण्ड की चाल नियत रहती है तथा उसकी दिशा में लगातार परिवर्तन होता रहता है, इसलिए पिण्ड का वग वृत्ताकार पथ पर परिवर्ती होता है

 

  • कोणीय विस्थापन (Angular displacement) :

माना कि एक पिण्ड बिन्दु A से वृत्तीय गति आरम्भ करता है और कुछ समय के बाद यह पिण्ड बिन्दु B पर रहता है । इतने समय में पिण्ड वृत्त की परिधि पर AB = l दूरी तय करता है । इतने ही समय में पिण्ड को वृत्त के केन्द्र से मिलानेवाली रेखा OA और OB द्वारा बना हुआ कोण AOB = Ө होता है

रेखीय दूरी । को रेखीय विस्थापन तथा कोण Ө को कोणीय विस्थापन कहते हैं । कोणीय विस्थापन सदिश राशि है । S.I. पद्धति में कोणीय विस्थापन का मात्रक रेडियन है । कोणीय विस्थापन विमाहीन है ।

अतः रेखीय विस्थापन = केन्द्र से पिण्ड की दूरी x कोणीय विस्थापन

 

  • कोणीय वेग (Angular velocity) :

जब कोई पिण्ड वृत्तीय गति अथवा कोणीय गति करता है तो कोणीय विस्थापन की दर को कोणीय वेग कहते हैं । इसे प्रायः ग्रीक अक्षर ω (ओमेगा) से निरूपित किया जाता है । S.I. पद्धति में इसका मात्रक रेडियन सेकेण्ड होता है । कोणीय वेग की विमा [T-I] होती है । यदि पिण्ड T सेकेण्ड में एक पूरा चक्कर अथवा 2 π रेडियन कोण से घूमता है तो कोणीय वेग,

ω  = 2 π / T

T पिण्ड का आवर्तकाल (Time period) है । यदि पिण्ड | सेकेण्ड में n चक्कर लगाता है तो आवर्तकाल,

T = 1/n

और    ω  = 2 π / 1/n = 2 π n

यहाँ n पिण्ड की परिभ्रमण आवृत्ति है । इसलिए n को पिण्ड की कोणीय आवृत्ति (Angulaer firequency) कहते हैं । कोणीय वेग एक सदिश राशि है । इसका परिमाण 0 के बराबर होता है |

  • अभिकेन्द्र त्वरन (Centripetal acceleration): .

जब कोई पिण्ड किसी अक्ष के चारों ओर एकसमान कोणीय वेग से घूमता है तो पिण्ड की चाल नियत रहते हुए भी उसके चलने की दिशा लगातार बदलती रहती है । वेग एक सदिश राशि है तथा इसका मान, दिशा और परिमाण दोनों के बदलने से बदल जाता है । अतः वृत्तीय गति में, दिशा में लगातार परिवर्तन से पिण्ड का वेग लगातार बदलता रहता है । इसे ऐसे भी कहा जा सकता है कि वृत्तीय गति में त्वरण रहता है । इस त्वरण की दिशा हमेशा वृत्त के केन्द्र की ओर रहती है । अतः इसे अभिकेन्द्र त्वरण कहते हैं । क्योंकि त्वरण की दिशा पिण्ड की गति की दिशा के लम्बवत् है, इसलिए इसे अभिलम्ब त्वरण भी कहते हैं ।

  • अभिकेन्द्र बल (Centripetal force) :

जब कोई पिण्ड नियत चाल v से r त्रिज्या के वृत्तीय पथ पर गति करता है तो उसपर v/r परिमाण का अभिकेन्द्र त्वरण कार्य करता है । त्वरण का मान तो हमेशा नियत रहता है लेकिन दिशा लगातार बदलती रहती है तथा हमेशा वृत्त के केन्द्र की ओर रहती है । न्यूटन के गति के नियम से वस्तु में त्वरण किसी बल से ही उत्पन्न हो सकता है तथा बल की दिशा त्वरण की दिशा में होती है । अतः यह स्पष्ट है कि वृत्तीय पथ पर गतिशील पिण्ड पर एक बल कार्य करता है जिसकी दिशा वृत्त के केन्द्र की ओर होती है । इस बल को ‘अभिकेन्द्र बल’ कहते हैं । इस बल के बिना वृत्तीय गति सम्भव नहीं है । यदि वृत्तीय पथ पर गतिशील पिण्ड का द्रव्यमान m हो तो अभिकेन्द्र बल का मान

F= द्रव्यमान – त्वरण

F = mv2 / r

  • अपकेन्द्र बल (Centrifugal force) :

हम देख चुके हैं कि किसी पिण्ड को वृत्तीय पथ पर घमाने के लिए अभिकेन्द्र बल आवश्यक होता है । माना कि चित्र में एक व्यक्ति P दरवाजे से सटकर बैठा है तथा कार सड़क की मोड पर वत्तीय पथ पर मुड़ती है । मोड़ पर कार के मुड़ते समय वह अनुभव करता है कि उसपर दरवाजे की ओर एक धक्का लगता है और दरवाजा खुल जाय तो वह कार के बाहर है । अतः व्यक्ति यह सोचता है कि उसपर एक बल F, जिसकी दिशा मोड के बाहर है, लग रहा है । कार में ही बैठा कोई अन्य व्यक्ति 0 जानता है कि वत्तीय गति में अभिकेन्द्र बल कार्य करता है तथा के गति के ततीय नियम से इस क्रिया के बराबर और विपरी कार्य करती है । उपर्युक्त बल F को अपकेन्द्र बल कहते हैं ता प्रतिक्रिया बल समझा जाता है । वास्तव में अपकेन्द्र बल का ॥ (Pseudo) बल है, प्रतिक्रिया बल नहीं ।

 

वर्तुल गति –

जब कोई कण किसी निश्चित बिंदु के चारो ओर निश्चित दुरी पर गति करे तो उसे वृतीय गति कहते है | यह  द्विबीमीय गति होती है |

वृत्तीय पथ पर साइकिल सवार की गति (Motion of a cyclist on a circular path) : –

माना कि साइकिल सवार v वेग से ऐसे वृत्तीय पथ पर चल रहा है जिसको त्रिज्या r है । तब पृथ्वी की अभिलम्ब प्रतिक्रिया R ऊपर की ओर. पथ्वी की पष्ठ और साइकिल के टायर के बीच का घर्षण का बल F तथा अपकेन्द्र बल m\frac{v^{2}}{t} चित्र में दिखायो गयी दिशा में क्रियाशील होते हैं । ऐसी स्थिति में R = mg और F = m\frac{v^{2}}{r }; तब संतुलन के लिए mg तथा m M\frac{v^{2}}{t} का आघूर्ण P के परितः मान में बराबर लेकिन दिशा में विपरीत होते हैं ।

यानि

अतः अपने को संतुलन में रखने के लिए साइकिल सवार उदन से वृत्तीय पथ के केन्द्र की ओर  कोण से झुक जाता है जहाँ ፀ = \tan ^{-1} \frac{v^{2}}{r g} अगर साइकिल सवार उदग्र होकर साइकिल चलाता तो उसका भार mg का आघूर्ण P के परितः शून्य होता और m\frac{v^{2}}{r}   का आघूर्ण P के परितः असंतुलित रह जाता । असल में साइकिल सवार पर कार्य करने वाले दो बल-युग्म बनाते हैं—एक बल-युग्म F और m\frac{v^{2}}{r}    से तथा दूसरा बल-युग्म R और mg से । साइकिल सवार को उदग्र चलने पर R और mg का अस्तित्व समाप्त हो जाता है और सिर्फ F तथा mv का अस्तित्व रह जाता है जिससे साइकिल सवार लुढ़क कर गिर जाता है। घर्षण बल F का अधिकतम मान umg होता है जहाँ । = साइकिल के टायर और जमीन के बीच के घर्षण गुणांक है । जब \frac{v^{2}}{r g}  का अधिकतम मान । के बराबर होता है तो साइकिल सवार नहीं लुढ़कता है । जब m\frac{v^{2}}{r } > umg या v^{2} > urg तब साइकिल सवार लुढ़क जायगा ।

अतः साइकिल सवार पर लुढ़केगा जब

(i) v का मान अधिक हो,

(ii) μ का मान कम हो यानि रास्ता फिसलने योग्य (Slippery) हो तथा

(iii) r का मान कम हो ।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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