chapter 2 units and measurements notes – class 11 physics notes pdf

    chapter – 2    मात्रक और विमा : मापन एवं मापों में त्रुटियाँ

     (UNITS AND DIMENSIONS : MEASUREMENT AND ERRORS IN MEASUREMENTS)

 

  • भौतिक राशियाँ (Physical Quantities)-

भौतिक राशियाँ वे हैं जिनके पदों (terms) में हम भौतिकी के नियमों को व्यक्त करते हैं; जैसेद्रव्यमान, लंबाई, समय, कार्य, बल, ऊर्जा इत्यादि।

भौतिक राशियाँ दो प्रकार की होती हैं –

  • आधारी या मूल राशियाँ (Basic or fundamental quantities)
  • व्युत्पन्न राशियाँ (Derived quantities)

 

  1. आधारी या मूल राशियाँ (Basic or fundamental quantities) –

आधारी या मूल राशियाँ वे हैं जो स्वतंत्र (independent) मानी जाती हैं; जैसे-द्रव्यमान, लंबाई, समय इत्यादि। वास्तव में आधारी राशियाँ सात (seven) हैं। इन मूल राशियों को हम भौतिक संसार की सात विमाएँ कह सकते हैं।

  1. व्युत्पन्न राशियाँ (Derived quantities) –

व्युत्पन्न राशियाँ वे हैं जो आधारी राशियों के पदों में व्यक्त की जाती हैं; जैसे क्षेत्रफल, वेग, बल, संवेग, कार्य इत्यादि।

 

  • मात्रक (Units) –

किसी भी भौतिक राशि की माप के लिए कुछ मानक मापों की आवश्यकता होती है। इसी मानक (standard) को उस राशि का मात्रक (unit) कहते हैं। ऐसे मानक माप (standard measures) एक निश्चित, आधारभूत (basic), मनमाने ढंग से चुने गए (arbitrarily chosen) तथा अंतरराष्ट्रीय रूप से मान्यता प्राप्त (internationally accepted) होते हैं।

Notes –

  • एक मात्रक (unit) —  जिसमें भौतिक राशि को व्यक्त किया गया है|
  • एक संख्यांक (numeral) – जो यह बताता है कि दी गई भौतिक राशि में वह मात्रक कितनी बार शामिल है।

 

इस प्रकार, किसी भौतिक राशि x की माप निम्नलिखित व्यंजक से दिखा  सकता है –

                                                          x=nu

– जहाँ n उस भौतिक राशि की माप का संख्यांक है और u उस राशि का मात्रक है |

 

  • मात्रकों की पद्धतियाँ (Systems of Units) –

– सभी प्रकार की राशियों के लिए मात्रको , मूल तथा व्युतपन्न दोनों , के पूर्ण समूह को मात्रको की पद्धति कहते है |

 

 

मात्रकों को पद्धतियाँ निम्नलिखित हैं –

  • फुटपाउंडसेकंड पद्धति (Foot-Pound-Second System)-

इस पद्धति को संक्षेप fps पद्धति कहते हैं। इस पद्धति में लंबाई का मात्रक फुट, द्रव्यमान का मात्रक पाउंड तथा का मात्रक सेकंड होता है। इस पद्धति को ब्रिटिश पद्धति (British System) भी कहते हैं।

  • सेंटीमीटरग्रामसेकंड पद्धति (Centimetre-Gram-Second System)-

इस पद्धति को संक्षेप में cgs पद्धति कहते हैं। इस पद्धति में लंबाई का मात्रक सेंटीमीटर, द्रव्यमान का मान ग्राम तथा समय का मात्रक सेकंड होता है। इस पद्धति को मीटरी पद्धति (Metric System) भी कहते हैं।

  • मीटरकिलोग्रामसेकंड पद्धति (Metre-Kilogram-Second System)-

इस पद्धति को संक्षेप में mks पद्धति कहते हैं। इसमें लंबाई का मात्रक मीटर, द्रव्यमान का मात्रक किलोग्राम तथा समय का मात्रक सेकंड होता है।

विद्युत एवं चुम्बकत्व में परिमेयित मीटर-किलोग्राम-सेकंड-ऐम्पियर पद्धति (Rationalised Metre-Kilogram-Second-Ampere System) जिसे संक्षेप में rmksa पद्धति कहते हैं. का उपयोग किया जाता है।

  • SI मात्रक (SI Units)

1960 में तौल एवं माप के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन (International Committee on Weights and Measures) ने मात्रकों की अंतरराष्ट्रीय पद्धति (System International d’Unites. संक्षेप में SI Units) के उपयोग की सिफारिश की। इसमें छह आधारी मात्रक (basic units) तथा दो संपूरक मात्रक (supplementary units) होते हैं। इस पद्धति के मात्रक SI मात्रक कहे जाते हैं।

 

  • SI मात्रक : एक संसक्त पद्धति (SI units : a coherent system)

उन सभी आधारी मात्रक (basic units) के एक सेट (set) को जिनके द्वारा सभी व्युत्पन्न मात्रक साधारण गुणा या भाग द्वारा प्राप्त हो जाते हैं- संसक्त पद्धति (coherent system) कहा जाता है। SI मात्रक, मात्रक की एक संसक्त पद्धति है।

मात्रकों की cgs पद्धति संसक्त पद्धति नहीं है।

 

  • आधारी तथा व्युत्पन्न मात्रक (Basic and Derived Units)

आधारी मात्रक – वह मात्रक जो किसी अन्य मात्रक पर निर्भर नहीं करता, उसे आधारी (basic) या मूल (fundamental) मात्रक कहते हैं। ये मात्रक एक-दूसरे से स्वतंत्र होते हैं।

मूल राशियों के मात्रकों को  आधारी मात्रक या मूल मात्रक कहते है जैसे – द्रव्यमान (mass),    लम्बाई (length) तथा समय (time) आदि सात मूल भौतिक राशियों के मात्रक आधारी मात्रक होते है |

व्युत्पन्न मात्रकउस मात्रक को जो आधारी मात्रकों पर निर्भर करता है, अर्थात जिसे आधारी मात्रकों के पद में व्यक्त किया जा सके, व्युत्पन्न मात्रक कहते हैं। इसी प्रकार वेग, त्वरण, बल, कार्य आदि के मात्रक व्युत्पन्न मात्रक हैं।

आधारी SI मात्रक (Basic SI Units)

SI के सात आधारी मात्रक (basic units) तथा दो संपूरक मात्रक (supplementary units) हैं। ये मात्रक तथा इनके संकेत सारणी में दिए गए हैं।

आधारी SI मात्रक

 

क्रम-संख्या                   भौतिक राशि                             SI मात्रक          SI मात्रक के लिए संकेत

 

  1. लम्बाई (length)            –                               मीटर (metre)                          m
  2. द्रव्यमान (mass) –                                         किलोग्राम (kilogram)                kg
  3. समय (time)                –                                सेकंड (second)                        s
  4. ऊष्मागतिक ताप (thermodynamic temperature) – केल्विन (kelvin)               K
  5. विद्युत धारा (electric current)         –            ऐम्पियर (ampere)                     A
  6. ज्योति तीव्रता (luminous intensity)  –                     कैंडेला (candela)             cd
  7. पदार्थ का परिमाण (amount of substance)     –       मोल (mole)                   mol

 

संपूरक SI मात्रक

क्रम-संख्या                 भौतिक राशि                                 SI मात्रक              SI मात्रक के लिए संकेत

  1. समतल कोण (plane angle)                                 रेडियन (radian)                  rad
  2. ठोस कोण (solid angle)                                     स्टेरेडियन (steradian)               sr

 

व्युत्पन्न SI मात्रक (Derived SI Units)-

व्यत्पन्न भौतिक राशियों के SI मात्रक निम्नलिखित प्रकार से निकाले जाते हैं

  • वेग = विस्थापन/ समय

 

 

  •              व्युत्पन्न SI मात्रक

 

  • SI मात्रक के गुण (Merits of SI Units)-

SI मात्रक के गुण निम्नलिखित हैं

(a) SI मात्रक का क्षेत्र बहुत ही व्यापक है और यह पूरे विश्व में विज्ञान तथा शिल्पविज्ञान (technology) की सभी शाखाओं के लिए उपयुक्त है।

(b) SI मात्रक निरपेक्ष (absolute) होते हैं।

(c) इसमें आधारी (मूल) मात्रकों की संख्या न्यूनतम है, जो काफी सुविधाजनक है।

(d) इसमें सभी व्युत्पन्न मात्रकों (derived units) को, बिना किसी संख्यात्मक गुणांक अथवा

स्वेच्छ नियतांक (arbitrary constant) के उपयोग के, आधारी (मूल) मात्रकों से प्राप्त किया जाता है।

(e) मात्रको मे दशमिक प्रणाली (decimal system) का उपयोग अर्थात 10 को घातों (powers) पर आधारित होने के कारण इस पति में रूपांतरण (conversion) अत्यंत सुगम एवं सुविधाजनक होता है।

की लगभग सभी व्यत्पन्न मात्रकों के नाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सर्वमान्य है।

 

  • मानक SI उपसर्ग (Standard SI Prefix)-

 

  • विमा (Dimensions)

आधिकांश भौतिक राशियों को प्रायः मूल मात्रकों, अर्थात लंबाई, द्रव्यमान, समय आदि के मात्रकों में, जिन्हें क्रमशः L. M. T आदि से व्यक्त किया जाता है, प्रदर्शित करते हैं।

किसी भौतिक राशि (physical quantity) का मात्रक प्राप्त करने के लिए, मूल मात्रकों पर लगाए जानेवाले घातों (powers) को उस भौतिक राशि की विमाएँ (dimensions) कहते हैं।

उदाहरणार्थ, वेग – लंबाई , समय

अतः, वेग की विमा लंबाई में 1 और समय में -1 है। किसी भौतिक राशि की विमा व्यक्त करने के लिए उस राशि को बड़े कोष्ठ (big bracket), अर्थात [ ] के अंदर लिखते हैं। जैसे

वेग] = वेग की विमा, क्षेत्रफल) = क्षेत्रफल की विमा इत्यादि।

 

                                   मूल आधारी  राशियों की विमाएँ

मूल (आधारी) राशि Fundamental (Basic) quantity]                                   विमा (Dimension)

द्रव्यमान (mass)                                                                                   M

लंबाई (length)                                                                                     L

समय (time)                                                                                         T

उष्मागतिकी  ताप (thermodynamic temperature)                               K या H

विद्युत-धारा (electric current)                                                            I या A

ज्योति तीव्रता (luminous intensity)                                                       C

पदार्थ का परिमाण (amount of a substance)                                        mol

 

  • विमीय सूत्र (dimensional formula)

किसी भी भौतिक राशि के मात्रक और लंबाई, द्रव्यमान एवं समय के मूल मात्रकों के वीच के संबंध को दर्शानेवाले व्यंजक को विमीय सूत्र (dimensional formula) कहते हैं। अतः क्षेत्रफल और वेग के विमीय सूत्र क्रमशः L और LT-1 हुए।

यदि इन सूत्रों को समीकरण के रूप में लिखा जाए तो प्राप्त समीकरण को विमीय समीकरण (dimensional equation) कहते हैं।

 

 भौतिक राशियों की विमाएँ या विमीय सूत्र ज्ञात करना (Determination

of Dimensions or Dimensional Formula of Physical Quantities)-

किसी भौतिक राशि की विमा ज्ञात करने के लिए सबसे पहले उस राशि को अन्य भौतिक राशियों, जिनकी विमा ज्ञात रहती हैं, में व्यक्त किया जाता है। फिर उस राशि-विशेष की विमा की गणना की जाती है। आगे कुछ भौतिक राशियों की विमा निकालकर दिखाई गई है।

 

 

विमीय समघाततता का सिद्धांत (Principle of Homogeneity of Dimensions)

 इस सिद्धांत के अनुसार, किसी भी विमीय समीकरण के प्रत्येक पट (term) बराबर होती हैं। दूसरे शब्दों में, भौतिक समीकरण विमीय रूप से समघातिय  होते हैं। किसी समीकरण में दोनों ओर का समान प्रकृति की राशियाँ ही समीकृत (equate) की जा सकती है उदाहरणार्थ,

3 m + 2 m = 5 m,

m+2 kg का कोई अर्थ नहीं है।

. …….

विमीय समीकरणों के उपयोग (Uses of Dimensional Equations)

विमीय समीकरण के निम्नलिखित उपयोग हैं

(a) किसी भी भौतिक राशि के मात्रक को एक पद्धति (system) से दूसरी पद्धति में  बदलना

(b) भौतिकी के विभिन्न सूत्रों की सत्यता की जाँच करना

(c) विभिन्न भौतिक राशियों के बीच संबंध स्थापित करना

 

(a) एक पद्धति के मात्रकों को दूसरी पद्धति के मात्रकों में बदलना (Conversions units from one system of units to another system of units)-

किसी भौतिक राशि का आंकिक मान (n), उसके मात्रक के परिमाण (u) के व्युत्क्रमानुपाती होता है। परंतु, इन दोनों के गुणनफल अर्थात n x u का मान हमेशा नियतांक होता है।

 

(b) भौतिकी के विभिन्न सूत्रों की सत्यता की जाँच करना (checking the correction of formula)-

इस जाँच का मूल आधार विमीय समघातता का सिद्धांत (principle of homogeneity of dimensions) है। इस सिद्धांत के अनुसार किसी भी भौतिक सूत्र या समीकरण के बाएँ और दाएँ पक्षों के सभी पदों को विमाएँ समान (बराबर) होनी चाहिए। स्पष्ट है कि यदि किसी दिए हुए सूत्र में दोनों पक्षों के पदों की विमाएँ असमान हैं, तो वह सूत्र निश्चित रूप से गलत है।

 

(c) विभिन्न भौतिक राशियों के बीच संबंध स्थापित करत between various physical quantities) -यदि किसी भौतिक राशि के विषय में ज्ञात हो की वह किन किन बातों पर  निर्भर करती है तो उस राशि एव अन्य राशियों  के बिच एक सम्बन्ध स्तथापित किया जा सकता है

 

 विमीय विश्लेषण की सीमाबद्धता (Limitations of Dimensional Analysis)

(a) इस विधि में मूलतः सात ही राशियों M, L, T आदि का उपयोग किया जाता है। अतः,

यदि कोई राशि सात से अधिक राशियों पर निर्भर करती है तो विमीय विधि द्वारा कोई

सूत्र स्थापित नहीं किया जा सकता।

(b) इस विधि द्वारा उन सूत्रों या समीकरणों का भी अध्ययन नहीं किया जा सकता है जिनम

त्रिकोणमिति (trigonometry), लघुगणकीय (logarithmic) अथवा चरघाताक

(exponential) के पद उपस्थित रहते हैं।

(c) इस विधि द्वारा प्राप्त किए गए सूत्रों या समीकरणों में यदि विमाहीन नियताक आ जात ।

तो उनके मान ज्ञात नहीं किए जा सकते। उन नियतांकों के मान प्रयोग द्वारा ही ज्ञात किए जाते हैं।

(d) इस विधि द्वारा उन सूत्रों की स्थापना नहीं की जा सकती जिनमें दो से अधिक पद (termi)

हों, जैसे सूत्र  =k की स्थापना तो हम कर सकते हैं, पर सूत्र  स्थापना नहीं कर सकते है।

 

 द्रव्यमान और इसकी माप (Mass and its Measurement)

किसी वस्तु में निहित पदार्थ के परिमाण को उसका द्रव्यमान (mass) कहा जाता है। यह पदार्थ का मौलिक गुण है, जो उसके ताप, दाब और स्थान-परिवर्तन पर निर्भर नहीं करता है।

जड़त्वीय एवं गुरुत्वीय द्रव्यमान

यदि दो वस्तुओं पर समान परिमाण के बल लगाए जाए, उनमे उत्पन्न त्वरण के अनुपात से उन वस्तुओं के द्रव्यमानों का अनपात प्राप्त होता है। इनम यदि एक का द्रव्यमान मानक किलोग्राम (standard kilogram) हो, तो दूसरी वस्तु का द्रव्यमान नात किया जा सकता है। इस प्रकार मापे गए द्रव्यमान को जड़त्वीय द्रव्यमान (inertial mass) ना जाता है। एक अन्य प्रकार से परिभाषित द्रव्यमान को गुरुत्वीय द्रव्यमान (gravitational mass) कहा जाता है। इसमें दो वस्तुओं के भार (weight) का अनुपात इनके गुरुत्वीय द्रव्यमानों के अनपात के बराबर होता है। परंतु, दोनों ही प्रकार से परिभाषित द्रव्यमान बराबर होते हैं।

 

लंबाई की मापन (Measurement of Length) –

किन्हीं दो बिन्दुओ के बीच की दूरी को दो विभन्न विधियों  से मापा जा सकता है

(a) सोधी विधि (direct method)          (b) परोक्ष विधि (indineer method)

(a) सीधी विधि (Direct method)-

सीधी विधि से लंबाई की माप एक मानक मोटर (standard metre) की छड़ से की जाती है। यदि किसी वस्तु की लंबाई इस मानक लंबाई को सात गुनी है तो कहा जाता है कि अमुक लंबाई सात मीटर है।

इस  विधि को सीधी विधि कहते है

(b) परोक्ष विधि (Indirect method) –

परोक्ष विधि का उपयोग बहुत ही सूक्ष्म या लम्बी दूरियों के आकलन में किया जाता है। इनके लिए मानक मोटर के सापेक्ष सोधी तुलना संभव नह होतो है। उदाहरण के लिए यदि किसी परमाणु का साइज (व्यास)  अथवा   पृथ्वो से किसी तारे को दूरी ज्ञात करनी हो, तो इन्हें मानक मोटर से सीधी तुलना (direct comparison) कर नहीं ज्ञात किया जा सकता है। इन दूरियों को मापने के लिए परोक्ष विधि प्रयुक्त होती है।

 

* छोटी दूरियों के मात्रक : अत्यंत छोटी लंबाइयों को व्यक्त करने के लिए निम्नांकित मात्रकों का प्रयोग किया जाता है|

(a) 1 मिलीमीटर (mm) = m. (उदाहरण के लिए, तार का व्यास = 1.67 mm.)

(b) 1 माइक्रोन = 1 माइक्रोमीटर (um) =  m.

(उदाहरण के लिए, लाल कणिकाओं का व्यास 10 माइक्रोन होता है।)

(c) 1 नैनोमीटर (nm) =  m.

(d) 1 ऐंग्स्ट्र म (angstrom) = 1 A =  cm =  m…

प्रकाश के तरंगदैर्घ्य (wavelength) को ऐंग्स्ट्रम (A) और नैनोमीटर (nm) में व्यक्त

किया जाता है।

(e) 1 फर्मी (fermi) = 1 फेम्टोमीटर (fm) = m…

यह मात्रक नाभिकीय दूरियों के मापन में प्रयुक्त होता है।

* अत्यंत बड़ी दरियों के मात्रक : अत्यंत बड़ी दूरियों को व्यक्त करने के लिए निम्नलिखित मात्रक उपयुक्त होते हैं

(a) 1 किलोमीटर (km) =  m.

(b) खगोलीय मात्रक (Astronomical unit, AU)- इसका मान सूर्य से पृथ्वी की माध्य दूरी

के बराबर होता है। 1 खगोलीय मात्रक (AU) =

(c) प्रकाश-वर्ष (Light year)_यह एक वर्ष में प्रकाश द्वारा निर्वात में तय की गई दूरी के – बराबर होता है।

1 प्रकाश-वर्ष (1.y.) = 946×1015 m.

(d) 1 पारसेक (parsec) = 308 x10l6 m = 3.26 प्रकाश-वर्ष (1.y.)

एक पारसेक वह दूरी है जिसपर पथ्वी की कक्षा (orbit) की माध्य त्रिज्या (mean radius) 1 आर्क सेकंड का कोण बनाती हो।

 

  • समय की माप (Measurement of Time) –

समय (वास्तव में समयांतराल) की माप में ऐसी गति का उपयोग किया जाता है जो बार-बार स्वतः दहराई जाती है, अर्थात प्रक्रिया आवर्त (periodic) होती है। पृथ्वी की दैनिक गति एसा हा एक आवर्त प्रक्रिया है जिसमें हम 1 दिन का समयांतराल ज्ञात करते हैं और इसे घंटा, मिनट आर सेकंड में बाँटते हैं। पूर्व काल में किसी ऊर्ध्वाधर छड़ की छाया की लंबाई देखकर समय का अनुमान लगाया जाता था।

गैलीलियो ने दोलक की गति से यह निष्कर्ष निकाला कि छोटे आयाम (amplitude) के दोलन के लिए आवर्तकाल समान रहता है। समयांतराल ज्ञात करने के लिए उन्होंने अपनी नब्ज की धड़कन (pulse beat) का उपयोग किया।

स्ट्रोबोस्कोपी विधि (stroboscopic method) द्वारा 10 सेकंड की कोटि के समयांतराल ज्ञात किए जा सकते हैं। इलेक्ट्रॉनिक घड़ियों से समय की माप के लिए विद्युत दोलन के सिद्धांत का उपयोग किया जाता है। पृथ्वी अपने अक्ष पर एक बार घूमने में जितना समय लेती है उसे सौर दिन (solar day) कहते हैं, परंतु सूर्य से पृथ्वी की दूरी बदलने के कारण सौर दिन पूरे वर्ष में एकसमान नहीं रहता। अधिक परिशुद्धता (precision) के लिए क्वार्ट्ज क्रिस्टल घड़ियाँ प्रयुक्त होती हैं जिनकी यथार्थता (accuracy) 109 में 1 होती है। इससे भी अधिक परिशुद्धता परमाणविक घड़ियों (atomic clocks) में होती है जो सीजियम परमाणु में उत्पन्न आवर्त कंपनों पर आधारित है। …

वृहत कोटि के समय की माप (Measurement of Large Order Time)

मानव इतिहास में समयांतराल की गणना शतकों (centuries) में की जाती है जबकि भूवैज्ञानिक (geologists) काल (era) की गणना सैकड़ों लाखों वर्षों के क्रम में करते हैं। ऐसा माना जाता है कि ब्रह्मांड का निर्माण लगभग 5×10 वर्ष पहले हुआ था। चट्टानों और जीवाश्मों (rocks and fossils) की आयु का आकलन रेडियोऐक्टिव विधि से किया जाता है। इतने बड़े समयांतराल की माप कार्बन काल-निर्धारण (carbon dating) से की जाती है जिसमें कार्बन के समस्थानिक 14C का उपयोग होता है। 14C की अर्ध-आयु 5600 वर्ष है तथा यूरेनियम-238 (238U) की अर्ध-आय 4.5×10 वर्ष है। रेडियोऐक्टिव प्रक्रमों में किसी चट्टान में उपस्थित 238U अंततः 206Pb में बदल जाता है और 238 तथा 206Pb के सापेक्षिक परिमाण की माप से चट्टान की आयु का आकलन होता है। पथ्वी के विभिन्न भागों से प्राप्त चट्टानों की आयु ज्ञात करने से पृथ्वी की आयु का अनुमान (लगभग 4×10 वर्ष) लगाया जाता है।

प्रेक्षणों में त्रुटियाँ (Errors in Observations) –

प्रायः सभी भौतिक राशियों के मापन में प्रेक्षण (observation) के क्रम में कुछ-न-कुछ अनिश्चितता (uncertainty) अवश्य ही रहती है। इसी अनिश्चितता को त्रुटि कहते हैं। इन्हें त्रुटियों के कारण प्राप्त मान यथार्थ मान से थोड़ा भिन्न होता है। मापी गई भौतिक राशि को शत-प्रतिशत यथार्थ (exact) नहीं कहा जा सकता है।

भौतिक राशि के प्रेक्षित मान (observed value) तथा यथार्थ मान (exact value) के अंतर को त्रुटि (error) कहा जाता है।

 त्रुटियाँ दो प्रकार की हो सकती हैं |

(i) क्रमबद्ध त्रुटि (systematic error)

(ii) सांयोगिक त्रुटि (random or accidental error)

(i) क्रमबद्ध त्रुटि (Systematic error)—जिस त्रुटि का कारण का पता लगाया जा सकता है  उसे क्रमबद्ध त्रुटि कहा जाता है। ऐसी त्रुटियाँ हमेशा किसी निश्चित नियमानुसार अर्ताथ किसी एकही दिशा में धनात्मक या फिर ऋणात्मक होती हैं तथा त्रुटियों का कारण ज्ञात ज्ञात रहने पर उन्हें दूर किया जा सकता है । क्रमबद्ध त्रुटियाँ निम्नलिखित कारणों से हो सकती है

(a) उपकरण के दोष के कारण

(b) प्रेक्षक (observer) की वैयक्तिक (personal) विशिष्टताओं के कारण तथा

(c) बाहरी परिस्थितियों के कारण, जैसे-ताप-परिवर्तन आदि

(ii) सांयोगिक त्रुटि (Random or accidental error)-

क्रमबद्ध त्रुटियों के उपर्युक्त तीनों कारणों को दूर करने पर भी भौतिक राशि में अनिवार्यतः (essentially) कुछ त्रुटि रह ही जाती है। इस प्रकार की त्रुटियों का कारण ज्ञात नहीं रहता पर सांख्यिक विधि (statistical method) से इसकी विवेचना की जा सकती है। ऐसी त्रुटि  को सांयोगिक त्रुटि कहा जाता है। उदाहरण के लिए, एक पिन विधि से उत्तल लेंस की फोकस-दरी मापने पर सभी पाठ्यांक एक समान नहीं आते हैं। इस त्रुटि को सांयोगिक त्रुटि कहा जाता है।

अवशेष (Residuals) –

सांयोगिक त्रुटियों के धनात्मक तथा ऋणात्मक होने की संभावना समान होती है तथा प्रेक्षणों का समांतर माध्य (arithmetic mean) लेने पर त्रुटि बहुत कुछ कम हो जाती है। यदि लिए गए n प्रेक्षणों का समांतर माध्य X हो, तो

समांतर माध्य X को अधिकतम संभाव्य मान (most probable value) कहा जाता है। यह मान (अर्थात X) मापी गई राशि के यथार्थ मान (exact value) से थोड़ा भिन्न अवश्य होता है। प्रेक्षित (observed) एवं अधिकतम संभाव्य मान के अंतर को अवशेष (residuals) कहा जाता है।

माध्य निरपेक्ष त्रुटि, आपेक्षिक त्रुटि एवं प्रतिशत त्रुटि (Mean AbsoluteError, Relative Error and Percentage Error) –

यदि किसी भौतिक राशि का यथार्थ मान X हो तथा लिए गए N प्रेक्षणों से प्राप्त मान क्रमशः , …हों, तो प्रेक्षणों की त्रुटियाँ क्रमशः  =  होंगी। चूँकि ये त्रुटियाँ धनात्मक और ऋणात्मक दोनों हो सकती हैं, परंतु निरपेक्ष त्रुटि (absolute error) अर्थात

; हमेशा धनात्मक होगी। अतः, त्रुटियों के चिह्नों की उपेक्षा करने पर इनका समांतर माध्य

a=

a के मान से औसत त्रुटि व्यक्त होती है। निरपेक्ष त्रुटि के स्थान पर प्रायः आपेक्षिक त्रुटि या प्रतिशत त्रुटि व्यक्त की जाती है जो माध्य निरपेक्ष त्रुटि (a) एवं भौतिक राशि के माध्य मान X के अनुपात से प्राप्त होती है, अर्थात

प्रतिशत त्रुटि = x100%.

अनिश्चित संख्याओं का पूर्णन (Rounding off the Uncertain Digjts) –

गणितीय परिकलन के बाद प्राप्त संख्या में दशमलव के बाट आनेवाले सभी संदिग्ध  अंकों (insignificant digits) को हटा दिया जाता है तथा दशमलव के बाई और आनेवाले संदिग्ध अंकों के स्थान पर शून्य लिखा जाता है। न्यूनतम सार्थक अंक (least significant digit) कापून fround off) करने के लिए निम्नलिखित नियम मान्य होता है।

जिस अंक : का पूर्णन करना है उसके बाद आनेवाला अंक यदि 5 से अधिक हो, तो पूर्णन करनेवाले अंक, अर्थात x में 1 जोड़ दिया जाता है तथा 5 से कम होने पर उप अपरिवर्तित छोड़ दिया जाता है। यदि पूर्णन करनेवाली संख्या x के बाद अंक 5 हो, तोर के विषम (odd) होने पर में 1 जोड़ा जाता है तथा x के सम (even) होने पर इसे अपरिवर्तित छोड़ दिया जाता है।

उदाहरण के लिए,

यदि संख्या 23472 को तीन सार्थक अंक तक पूर्णन करना हो, तो इसमें 2,3 तथा 4 सार्थक अंक होंगे तथा 7 तथा 2 महत्त्वहीन होंगे। अब चूँकि तीसरा सार्थक अंक 4 है तथा उसके बाद का अंक 5 से अधिक (अर्थात 7) है, अतः 7 तथा 2 के स्थान पर शून्य लिखेंगे तथा 4 में 1 जोड़कर इसे 5 से व्यक्त करेंगे।

अतः, तीन सार्थक अंक तक व्यक्त करने के क्रम में 23472 को 23500 से व्यक्त करेंगे। ठीक इसी प्रकार 17.823 को 17.8 से, 17.750 को 17.8 से तथा 14.65 को 14.6 से पूर्णन करते हैं।

objective question of units and dimension-

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